स्वामीआयुर्वेद स्वास्थसूत्रमाला - 17

आयुर्वेदीय आहारविधी - 9

आयुर्वेदीय आहारविधी का नौवाँ नियम है - अजल्पन्नहसन् तन्मना भुज्जीत।

इस नियम मे 3 महत्वपूर्ण बाते समाहित है -
१) आहार सेवन करते समय बातचीत नही करना चाहिए।
२) हँसते हुए भोजन ग्रहण नही करना चाहिए।
३) मन लगाकर एकाग्रता से भोजन करना चाहिए।

परंतु ये नियम पढकर आपको तो शायद हँसी भी आएगी। क्यों कि प्रचलित समय मे तो यह असंभव सा लगता है। आजकल खाना खाते समय सबको 'कंपनी' चाहिए। अकेला खाना 'बोर' होता है। इसीलिए दो मित्र या परिवार के अन्य लोग साथ मे बैठकर ही खाना खाते है। कहते है की साथ मे बैठकर खाना खाने से 'प्यार' बढ़ता है। परंतु आयुर्वेद तो कहता है कि 'अजीर्ण' (indigestion) बढ़ता है। क्यों की साथ मे बैठेंगे तो तरह तरह की बाते करेंगे। चर्चा की दिशा सकारात्मक रही तो हँसेंगे परंतु तणावपूर्ण रही हो शायद झगडा भी शुरू हो सकता है। हँसते हँसते तो अन्न के साथ साथ वायु का भी बहोत अंश पेट मे जाता है। जिसे आधुनिक विज्ञान aerophagia कहता है। यह अतिरिक्त वायु पाचन मे बाधा उत्पन्न करता है। अत्याधिक हँसने से पेट की मांसपेशीयाँ भी शिथिल हो जाती है एवं थक जाती है, जो पश्चात पाचनक्रिया मे ही बाधक सिद्ध होता है। तणावपूर्ण माहौल की वजह से क्रोधादि मानसभाव विचलित एवं प्रकुपित हो जाते है, जो पुनः पाचनतंत्र को अवसादित कर देते है। एकाग्रता इन सब व्यवधानों से मन को बचाती है, सुरक्षित करती है। जिससे पाचन सुलभ होता है। इसीलिए भोजन अकेले और एकान्त मे ही लेना चाहिए।

संप्रति कुछ लोग विभक्त परिवार पद्धती कि वजह से अकेले और एकान्त मे ही खाना खाते है। या यूँ कहो कि अकेले खाने को मजबूर है। फिर भी इनको पाचन की समस्यायें तो रहती है। क्यूँ की इनका 'एकान्त' भी टीवी या मोबाईल के साथ होता है। एकान्त मे शांति से आहारसेवन का उपदेश मन की एकाग्रता साधने के लिए है। परंतु टीवी या मोबाईल का साथ, इस उद्देश को ही तिलांजली देता है। वैसे यह आदते एक ही दिन मे विकृति उत्पन्न नही करती। इनका सातत्य ही विकृति को जन्म देता है। परंतु यह आदते दैनिक जीवन मे इतनी आत्मसात हो गई है की टीवी या मोबाईल के कारण पाचनशक्ती मे विकृती आ सकती है, यह आधुनिक मनुष्य सोच भी नही सकता। परंतु आयुर्वेद ने तो इस बात को इ.स. पूर्व दूसरे शतक मे ही स्पष्ट कर दिया था। अतएव नियम भले ही छोटा हो पर स्वस्थ रहने के लिए भोजन करते समय एकाग्रता बनाये रखना अत्यंत आवश्यक है। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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