स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 22

अचानक ?

कुछ दिन पहले की बात है। एक पेशंट अपने भाई एवं भाभी के साथ ओपीडी मे आया। उम्र थी 52 वर्ष, परंतु लग रहा था 72+.. शरीर पूरा सुखा हुआ। शरीर मे थोडी भी ताकत बची नही। चलते वक्त लडखडाता था। पूँछने पर उसके भाईने उसका पूरा इतिहास बताया की 'सर, इसका ये हाल 'अचानक' से हुआ। 10 दिन पहले तक तो ठीक था। फिर अचानक से झटका आया और चलना बंद हो गया। बोलना बंद हो गया।'

अधिकतर लोग ऐसे ही शब्दों मे व्याधी का इतिहास बताते है और सबके कथन मे एक शब्द सामान्य (common) होता ही है - अचानक। परंतु इस बात का ध्यान रखिये की ऐसा अचानक या एकदम कुछ भी नही होता। न इस संसार मे, न ही मनुष्य शरीर मे। कोई भी घटना घटने के पहले उसकी छोटीसी पूर्वसूचना तो मिलती ही है, फिर वो घटना चाहे कितनी ही क्षुद्र या बडी ही क्यूँ न हो।

वर्षा ऋतु मे हम देखते है की एकदम से बारिश नही शुरू होती। पहले बादल आते है। फिर तेज हवा चलने लगती है। फिर बारिश आती है। भूकंप आने से कुछ दिन पहले भी भूगर्भ मे थोडा-थोडा क्षणिक कंप तो होता ही रहता है, एकदम से भूकंप नही होता। तद्वत परिवर्तन हमारे शरीर मे भी होते है। उलटी आनी हो, तो उसके पहले जी मचलता है। मुँह मे पानी छूटता है, बाद मे ही उलटी होती है। द्रवमलप्रवृत्ति (Diarrhoea) होनी हो, तो पेट मे गुडगुड होता है, उसके बाद ही शौचवेग आते है। ब्लडप्रेशर बहोत बढकर मस्तिष्क मे कोई रक्तवाहिनी फूटे, उसके पहले सिर का पिछला हिस्सा भयंकर दर्द करने लगता है। इसीलिए यह तो ध्यान मे रखना ही चाहिए की अचानक या एकदम से कुछ भी नही होता। प्रत्येक घटना घटने से पहले उसकी पूर्वसूचना प्रकृति (Nature) या शरीर किसी न किसी रूप मे मनुष्य तक पहुँचाते ही है। यह पूर्वसूचना समझना - न समझना ये व्यक्ति की समझ तथा मानसिक तरलता पर आधार रखता है। डॉक्टर लक्षणों के आधार पर पूर्वसूचना को तो समझते ही है। क्यों की उन्हे शरीर विज्ञान का ज्ञान होता है। परंतु अपने शरीर मे कुछ तो गडबड हो रही है या होनेवाली है, इतना तो प्रत्येक मनुष्य समझता ही है। इसके लिए कोई बडा डॉक्टर बनने की आवश्यकता नही। पर आजकल लोग इतने व्यस्त हो गये है की शरीर ऐसी पूर्वसूचना देता भी है, तो वो समझने के लिए उनके पास समय नही होता। गरीब मजदूरों को समझ के भी फायदा नही होता, क्यों की आर्थिक विवशता उन्हे पूर्वसूचना की तरफ दुर्लक्ष करने पर मजबूर कर देती है।

स्वास्थ्यविषयक जागरूकता (Health awareness) इसीलिए जरुरी है। अन्यथा छोटी व्याधियों को बडी व्याधियों मे परिवर्तित होने मे देर नही लगती और जब यही छोटी व्याधियाँ 'अचानक' से बडी हो जाती है, तब उन्हे ठीक करना इतना आसान नही होता, जितना रुग्ण सोचता है। इसीलिए शरीर मे थोडे भी क्रियात्मक या संरचनात्मक परिवर्तन दिखाई दिये तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना हितावह होता है। क्यों की ये छोटे परिवर्तन भी आनेवाले भयंकर व्याधी के पूर्वरूप हो सकते है। जैसे आतंकवादी हमला भी अचानक ही होता है। पर पूरी खोज-बीन के बाद पता चलता है की यह एक सोची-समझी (Planned) साजिश थी। अचानक से प्रगट होनेवाली व्याधियाँ भी ऐसी ही रहती है। सम्प्राप्ति (Pathogenesis) कई दिनो से बनती रहती है और अनुकूल समय पाकर 'अचानक' सतह पे आ जाती है। इसीलिए ध्यान रहे, अचानक कुछ भी नही होता।

'अचानक' स्थिती की रोकथाम

अधिकतम 'अचानक' उत्पन्न होनेवाली स्थितीयाँ गंभीर स्वरुप की होने की वजह से इनकी चिकित्सा सहजसाध्य नही होती और बहोत खर्चीली भी होती है। अतःएव ऐसी स्थिती को उत्पन्न होने से रोकना ही बुद्धिमानी होती है। आयुर्वेद इसी उद्देश्य से दिनचर्या तथा ऋतुचर्या का पालन करने की सलाह देता है। परंतु जहा चैन से साँस भी नही ले सकते ऐसी तेज भागदौड की जिंदगी मे यह बात पूर्णरूप से संभव भी नही। ऋतुशोधन इसी समस्या का इलाज है। ऋतुशोधन अर्थात ऋतुनुसार पंचकर्म करवाना। मतलब जब दिनचर्यादि प्रकारों का अनुसरण नही किया जा सकता, तब ऋतुशोधन अवश्य करवाना चाहिए। जैसे वसंत ऋतु मे वमन, वर्षाऋतु मे बस्ती और शरद ऋतु मे विरेचन तथा रक्तमोक्षण। यदि ऋतुशोधन भी संभव नही हुआ, तो कमसे कम एक दिवसीय सद्योविरेचनम जरूर करना चाहिए। केवल सद्योविरेचनम का भी अनुसरण करने से भयंकर से भयंकर व्याधियाँ टाली जा सकती है। परंतु अगर ये भी संभव नही तो कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स की एक एक दिन की 10 से 15 हजार फीस भरने के लिए तैयार रहिए। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव- 444303, महाराष्ट्र, भारत

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