स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 25

डायबिटीज और बीपी मे चिकित्सापद्धति का चुनाव

डायबिटीज और बीपी मे चिकित्सापद्धति का चुनाव

Selection of Therapy in Diabetes & Blood Pressure

स्वातंत्र्योत्तर काल मे बदली हुई जीवनशैली ने कुछ नये व्याधियों को भी जन्म दिया। मधुमेह (Diabetics) और उच्च रक्तचाप (Hypertension or Blood pressure) ये दोनो व्याधी इसी बदली हुई जीवनशैली का प्रसाद है। मधुमेह से पीडित लोगों की संख्या मे भारत का स्थान तिसरा है और उच्च रक्तचाप के कुल 18% नये रुग्णों का प्रतिवर्ष निदान होता है। ऐसे व्याधियों का जब भी निदान (diagnosis) होता है तभी से रुग्ण एलोपैथी औषधियाँ लेना शुरू कर देता है। क्यों कि आजकल एलोपैथी लोगो की पहली पसंद है। एलोपैथी औषधियाँ लेना आसान है। सर्वत्र आसानी से उपलब्ध है। कही भी लाई-ले जा सकती है। डायबिटीज और बी.पी. के लिए उपयोग मे लाने जानेवाली प्राथमिक औषधियाँ (Basic molecules) सस्ती भी है। उपर से आयुर्वेद जैसा कोई खास परहेज नही। जो चाहे वो खाओ और औषधियाँ लेते रहो। एलोपैथी औषधियों से रक्तशर्करा और बी.पी. तुरंत कम भी हो जाता है। परंतु अगर उपरोक्त सभी बातें सच है, तो फिर आज तक मधुमेह और उच्च रक्तचाप का पृथ्वी से निर्मूलन हो जाना चाहिए था। पर ऐसा कही हुआ है - ये तो कही न देखने मे है, न ही सुनने मे। उलटा नियमित रूप से औषधी शुरू होने के बाबजूद भी, रक्तशर्करा नियंत्रण मे रहने के बावजूद भी मोतियाबिंद का आगमन जल्दी हो जाता है। हाथ और पैरो के तलुओ मे जलन होना शुरू हो जाती है।
ब्लडप्रेशर बढना शुरू हो जाता है। किडनी (वृक्क) की कार्मुकता (working capacity) कम होना शुरू हो जाती है। उपरोक्त लक्षण लेके रुग्ण जब डॉक्टर के पास जाता है तब डॉक्टर रक्तशर्करा की जाँच कर लेते है और जाँच मे तो रक्तशर्करा सामान्य ही पाई जाती है। फिर भी उपरोक्त लक्षण उत्पन्न होकर उनकी प्रगति शुरू ही रहती है। इसका स्पष्ट अर्थ तो यही हुआ की व्याधी से शरीर का रक्षण करने के लिए जिन औषधियों पर विश्वास किया, उन्होने ही धीमे धीमे पूर्ण शरीर का भक्षण कर लिया।

ब्लड प्रेशर की औषधियों के बारे मे भी यही बात ध्यान मे आयी है। जैसे ही ब्लडप्रेशर का निदान होता है, रुग्ण डॉक्टर की सलाहनुसार बीपी की औषधी शुरू कर देते है। चूँकी बीपी होना या बीपी की गोली लेना आजकल एक वैभव-प्रतिक (status symbol) हो गया है, इसीलिए भी लोग बीपी की गोली नियमित रूप से लेते है। क्यों कि गोली लेने मे ना तो कोई दिक्कत है, न ही स्वाद की समस्या। गले मे धकेल दी की तुरंत उपर से पानी पी लो - बस हो गया। इन सब सुविधाओं के चलते बीपी की चिकित्सा नियमित लेने मे कोई आनाकानी नही करता। कई रुग्ण तो इतने भिषगवश्य रहते है की एक भी दिन औषधि बंद नही करते। फिर भी 15-20 वर्षो के अनन्तर बीपी के रुग्णों मे हृदयविकार (Concentric LVH), वृक्क विकार (Chronic kidney disease) या रक्तवाहिनीयों के विकार रुग्णों(Arteriosclerosis) तो अपरिहार्यत: उत्पन्न हो ही जाते है। इसका साफ साफ अर्थ यही है की बीपी की औषधी ने सिर्फ बीपी आँकडा ही नियंत्रण मे रखा। बाकी बीपी की वजह से परदे के पीछे जो शरीर विघातक प्रक्रिया चालू थी वो तो बंद हुई ही नही।

उपरोक्त वर्णन स्पष्ट रूप से आधुनिक औषधों की असफलता को दर्शाता है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप मे आधुनिक औषधों की उपयोगिता निश्चित ही है। परंतु अल्पकाल के लिए। दीर्घकाल मे इन औषधियों का उपयोग स्वस्थता का सिर्फ आभासीय (भ्रामक) परिणाम उत्पन्न करता है। क्यों कि अगर यह सत्य नही होता तो लम्बे समय तक नियमित रूप से औषधि लेने के बावजूद, बीपी सामान्य रहने के बावजूद उपद्रव उत्पन्न ही नही होते। इसीलिए बढी हुई रक्तशर्करा या रक्तचाप जैसे ही सामान्य हो जाये, तभी से आयुर्वेदिक औषधियों को अपनाना चाहिए।

ध्यान रहे, मधुमेह कभी भी ठीक नही होता। आयुर्वेद के ऋषि मुनी ही यह 2000 वर्ष पूर्व कहके गये है। इसीलिए ओषधियाँ चाहे एलोपैथी हो या आयुर्वेदिक- सेवनसातत्य तो रखना ही पडता है। मधुमेह को पूर्णतः नियंत्रित रखने के साथ साथ आयुर्वेदिक औषधियों का अतिरिक्त लाभ यह है की इससे उपद्रव कभी भी उत्पन्न नही होते। आयुर्वेदिक औषधियों की कुछ अपनी व्यवहारिक कमिया जरूर है। परंतु योग्य अवस्था उचित मात्रा और अनुकूल आहारविहार साथ में उनका उपयोग किया जाये, तो आयुर्वेदिक औषधियाँ निश्चित रूप से लाभदायी है।
उच्च रक्तचाप (High Blood pressure) तो आयुर्वेदिक औषधियों से पूर्ण ठीक होता है, अगर किसी तज्ञ आयुर्वेदिक वैद्य द्वारा चिकित्सा की जाये तो। इसीलिए मधुमेह या उच्च रक्तचाप की चिकित्सा के लिए चिकित्सापद्धति का चुनाव सोच समझकर ही करे। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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