स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 27

स्वयंचिकित्सा - आत्मघाती कदम

स्वयंचिकित्सा - आत्मघाती कदम
Dangers of Self Medication

स्वयंचिकित्सा अर्थात डॉक्टर की सलाह लिए बिना ही किसी व्याधि के लिए खुद ही औषधि चुनना और उसका उपयोग करना। मनुष्य मे यह आदत एक सहज प्रवृत्ति के रूप मे देखी जा सकती है। परंतु विकसनशील देशो के नागरिकों मे यह प्रवृत्ति ज्यादा पाई जाती है। सम्प्रति इस प्रवृत्ति के दो मुख्य कारण पाये जाते है।
1) गरीबी
2) डॉक्टरों पर अविश्वास

भारत मे कुछ लोग इतने गरीब है की डॉक्टरों का परामर्श शुल्क (Consultation Fee) देना उनके बस की बात नही है। इसीलिए वो लोग मेडिकल दुकानवाला /पडोसी/मित्रपरिवार मे किसी को पूँछकर अपनी व्याधी का निराकरण ढूँढने की कोशिश करते है। कुछ लोगों को पैसो की समस्या नही होती। परंतु भूतकाल मे डॉक्टरों के साथ आये हुए कटु अनुभव के चलते वो भी मजबूरीवश ऑनलाइन, समाचार पत्र-पत्रिकाओं मे व्याधियों के उपचार ढूँढते रहते है। परंतु मुख्य प्रश्न यह है की कारण कुछ भी हो, क्या ऐसा करना सही है?

उत्तर है - नही...

क्यों कि एक सामान्य व्यक्ति उसे हुई व्याधी का उचित निदान नही कर सकता। स्वतः ही गलत निदान करके ली गई औषधि गलत परिणाम उत्पन्न कर सकती है। कभी कभी ऐसी स्वयंचिकित्सा से गंभीर व्याधि के लक्षण कुछ समय तक दब जाते है, परंतु बाद मे वही व्याधि दोगुना गंभीर होके उभरता है। कौनसी औषधि किस मात्रा मे लेनी है, यह पता नही रहता। इसीलिए अनर्थ होने की संभावनाए ज्यादा रहती है।

प्रत्येक व्याधी के कारण, स्थिती, उपचार हर वक्त एक जैसे ही रहेंगे, ऐसा नही है। इनके विविध कारणों को तथा उनसे निर्मित व्याधी का संबंध एक डॉक्टर ही स्पष्टरूप से समझ सकता है। इसीलिए किसी भी व्याधि की स्वयंचिकित्सा करने से बेहतर है किसी अच्छे डॉक्टर से मिलकर, उनकी सलाह लेकर स्वयं को व्याधिमुक्त करे।

सामान्य से सामान्य (Very common) व्याधी की उत्पत्ति प्रक्रिया भी अलग अलग रोगियों मे अलग-अलग होती है। जैसे किसी को तला हुआ खाने से अम्लपित्त होता है, किसी को तीखा खाने से अम्लपित्त होता है, किसी को खट्टा खाने से अम्लपित्त होता है, किसी को सिर्फ धुप मे घूमने से अम्लपित्त होता है, तो किसी अत्याधिक चिंता की वजह से अम्लपित्त होता है। मतलब व्याधी तो एक ही है, परंतु उसके उत्पत्ति के कारण अलग अलग है। आयुर्वेद मे इसीलिए तो कारण के निवारण को ही आधी चिकित्सा कहा गया है। प्रत्येक कारण से एक अलग प्रकार से व्याधिनिर्मिती होती है। डॉक्टर को शरीरक्रिया तथा शरीररचना का सूक्ष्म ज्ञान होता है। इसीलिए किसी एक कारण से व्याधि की उत्पत्ति कैसे हुई होगी, यह एक डॉक्टर ही अच्छी तरह से समझ सकता है। अतःएव व्याधि कोई भी हो- छोटी या मोटी- एक तज्ञ डॉक्टर की सलाह लेकर चिकित्सा लेना ही उचित रहता है। अन्यथा कभी कभी 100 रु. बचाने के चक्कर मे आदमी गलत या देर से दवा लेकर 10,000-20,000 रुपये एक ही दिन मे खर्च कर देता है। जो काम पहले ही डॉक्टर की सलाह लेकर 500-1000 रुपये मे निपटाया जा सकता था, उसी के लिए वह व्यक्ति अब रु. 10,000-20,000 एक ही दिन मे खर्च कर देता है। उपर से जो मानसिक क्लेश हुए वो तो गिने ही नही।

मान लीजिए, किसी फलाना व्यक्ति को पीलिया (Jaundice) हुआ और उसे फलाना औषधि से अच्छा हुआ। इसका मतलब यह नही की वो पीलिया वाली औषधि सभी लोगों मे पीलिया पर ही और उतने ही शक्ती से कार्य करेगी। क्यों कि अगर ऐसा होता तो दुनिया मे डॉक्टरों की जरुरत ही नही रहती। लोग बाजार से मिलनेवाली औषधियाँ लेकर ही ठीक हो जाते।

आजकल तो व्हाट्सअप और फेसबुक जैसे सोशल मिडिया के माध्यमों द्वारा स्वयंचिकित्सा का फैलाव तो और ज्यादा हुआ है। पहले यही काम समाचार पत्र-पत्रिकाये करते थे, आज वही काम सोशल मिडिया करता है। इसीलिए डेंग्यु का निदान होते से ही लोग पपीते के पत्ते चारे जैसा खाना शुरू कर देते है। किसी फलाना व्यक्ति को पपीते के पत्ते का स्वरस पीने से डेंग्यु(?) मे फायदा हुआ होगा, तो उसने सोशल मिडिया पे उसके अनुभव को साझा किया। फिर तो पपीते की ऐसी चल पडी की आज डेंग्यु मतलब पपीता ऐसा समीकरण हो गया है। पपीता उष्ण है और वो भी इतना उष्ण की ज्यादा पपीता खाने से गर्भपात हो सकता है। ऐसा अत्याधुनिक उष्ण फल डेंग्यु जैसे पित्तज ज्वर मे किस दृष्टिकोण से समर्थनीय है, यही समझ नही आता। डेंग्यु एक अत्यंत आशुकारी (Fast Progressing) व्याधी है, जहाँ तत्काल चिकित्सा की जरुरत होती है। ऐसी स्थिती मे घर पर ही 'पपीते के प्रयोग' कर के समय नष्ट करना मतलब अपनी या अपने सगे-संबंधियों की जान से खेलने के बराबर होता है।

मेथी+कालाजिरा+अजवायन यह ऐसा ही एक औषधी संयोग है, जिसे चमत्कारी दवा के नाम से समाज को परोसा जा रहा है। इस मिश्रण का फायदा सिर्फ कफप्रकृती के लोगों मे या जिनके शरीर मे आम बढा हो ऐसे व्यक्तियों मे एक विशीष्ट काल तक ही किया जा सकता है। परंतु आजकल सभी लोग बिना सोचे समझे और प्रचुरता से इसका उपयोग करते है। तीनो औषधियाँ उष्ण गुणयुक्त है, इसीलिए इस मिश्रण का निरंतर उपयोग करनेवालों मे मलबद्धता (constipation) सिरदर्द (headache), अग्निमांद्य, सदाह मूत्रप्रवृत्ती (Burning micturition), सदाह मलप्रवृत्ती(Burning defecation), मुँह सूखा रहना (dry mouth), महिलाओं मे मासिक धर्म के दरम्यान अत्याधिक रक्तस्त्राव (menorhagia) ऐसे अवांछित परिणाम देखने को मिले है। एक रुग्ण मे तो इसी औषधिसंयोग की वजह से उदावर्तनजन्य मनोविकार देखने मे आये है।

अतिसार (diarrthoea, द्रवमलप्रवृत्ति) मे भी लोग आजकल दो-चार बार क्या द्रवमलप्रवृत्ति हुई की तुरंत लोपॅमाइड/लोपेरामाइड की गोली ले लेते है। अतिसार मे बिना सोचे समझे द्रवमलप्रवृत्ति रोकने के लिए औषधी लेने का तो आयुर्वेद मे घोर निषेध किया गया है। ऐसा करने से ११प्रकार के नये रोग उत्पन्न होते है ऐसा बताया है। कब्ज मे भी यही स्थिती पाई जाती है। लोग डॉक्टर की सलाह लिए बिना ही बाजार मे मिलता हुआ कोई भी चूर्ण लेना शुरू कर देते है। पहले पहले तो उससे फायदा होता है, परंतु बाद मे वही चूर्ण मात्रा बढाने पर भी काम नही करता इसका एकमात्र कारण है - चूर्ण सेवन के काल मे गलती। चूर्ण कब और कितना सेवन करना चाहिये यह रुग्ण की प्रकृति, व्याधी, व्याधि-अवस्था और संबंधित दोष की स्थिती देखकर ही निश्चित किया जा सकता है, जो सिर्फ एक तज्ञ आयुर्वेदिक डॉक्टर ही कर सकता है।

अतः एव छोटे से छोटे व्याधी मे भी स्वयंचिकित्सा करना उचित नही है। स्वयंचिकित्सा से रोगी की जान भी जा सकती है। इसीलिए स्वयंचिकित्सा से बचे एवं तज्ञ डॉक्टर की सलाह लेकर अपने आप को सुखी एवं सुरक्षित करे।अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव ४४४३०३, महाराष्ट्र

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