स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 28

काला मुनक्का - भाग 4

मृद्विका बृंहणी वृष्या मधुरा स्निग्धशीतला।

मृद्विका अर्थात मुनक्का। बाजार मे आजकल दो प्रकार के मुनक्का उपलब्ध है। पीले और काले। दोनो के गुणधर्म एक समान ही होते है। फिर भी काला मुनक्का पीले मुनक्के से श्रेष्ठ माना जाता है। क्यों कि काले मुनक्के मे सभी प्राकृतिक गुणधर्मों का प्रकर्ष देखने को मिलता है। यही काला मुनक्का अगर सेन्द्रिय (organic) हो तो क्या कहने!! स्वामीआयुर्वेद काला मुनक्का ऐसा ही एक सेन्द्रिय उत्पाद है। इसीलिए अपने प्राकृतिक गुणों से परिपूर्ण है।

बृंहण - मुनक्का बृंहण है मतलब वजन बढ़ानेवाला। मुनक्का शरीर मे स्थित मांसधातु पर काम करता है। मांसधातु को पोषण देता है तथा अन्य धातुओं का भी तर्पण करता है। इसीलिए जिनका वजन कम है, वो लोग मुनक्के का निरंतर उपयोग कर सकते है। एतदर्थ खाना खाते वक्त हर निवाले के साथ एक-दो मुनक्का खाना चाहिए। भोजन मे मुनक्के का इस तरह से सेवन करना पाचन मे बहोत लाभदायी रहता है। पाचकस्रावों की कमी से उत्पन्न होनेवाले पाचनसंस्थान की व्याधियों मे मुनक्का उत्तम कार्य करता है।

फेंफडो का टीबी, दीर्घकालीन बुखार, कैन्सर, न्यूमोनिया, टायफाइड जैसे व्याधियों मे रोगी का वजन बहोत घट जाता है। ऐसी स्थिती मे हर प्रकार से काले मुनक्के का सेवन करना चाहिए। चटनी, शर्बत, सूप ऐसी अनेक कल्पनाओं द्वारा मुनक्के का सेवनार्थ उपयोग किया जा सकता है।

वृष्या - वृष्य अर्थात कामशक्तिवर्धक। मुनक्का मधुर रसात्मक (मीठे स्वादवाला) होने से शुक्रधातु का पोषण करता है। शुक्रधातु के विकारों मे भी कई तरह के उपप्रकार है-जैसे शुक्राणूअल्पता (oligospermia), शुक्राणुहीनता (oligozoospermia) हीनशुक्राणुता (Asthenospermia), नंपुसकत्व (Erectile dysfunction), मैथुनेच्छा नष्ट होना (loss of libido)। इन सभी विकारों मे मुख्य औषधियों के साथ मुनक्के के क्वाथ (सूप) का उपयोग किया जाता है।

मधुरा - मुनक्का स्वाद मे मीठा है। बच्चों से लेकर बुंढो तक सभी इसे बडे प्यार से खाते है। मीठा होने के कारण यह खाने के बाद शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है। इसीलिए चाय की जगह मुनक्के के सूप का उपयोग पीने के लिए किया जा सकता है। मुनक्के के सूप मे स्वाद के लिए कालानमक, जीरा और धनिये की पावडर भी मिक्स की जा सकती है। बुखार या अन्य ज्वरप्रधान व्याधियों मे परहेज का सख्ती से पालन करना पड़ता है। परंतु बिमार व्यक्ति की सदैव चटपटा खाने की इच्छा होती है। ऐसी स्थिती मे उपरोक्त सूप अथवा दाडिम के दाने मिलाकर बनायी हुई काले मुनक्के की चटनी सेवन कराई जा सकती है।

स्निग्ध - मुनक्का स्निग्ध होता है। मतलब जो शरीर भावों मे मृदुता, कोमलता उत्पन्न करता है। इसीलिए त्वककाठिण्य ( sclerosis), केशरुक्षता (coarse hairs) जैसी स्थितीयों मे मुनक्के का दीर्घकालीन सेवन हितावह होता है। कुछ युवक-युवतीओ के बाल अत्यंत रुक्ष रहते है। कंडिशनर का उपयोग करो या किसी तैल का - कोई फर्क नही पडता। ऐसी स्थिती मे त्वचा एवं बालों को नर्म एवं मुलायम बनाने के लिए आहार मे सदैव मुनक्के का समावेश करना चाहिए। मुनक्का रसधातु का पोषण करता है। इसीलिए त्वचा और बालों पर उत्कृष्ट कार्य करता है।

आजकल मासिक धर्म के पहले अथवा उसके दरम्यान अधिकतर महिलाओं को पेडू (lower abdomen) मे तीव्र दर्द होता है। काले मुनक्के का सूप भोजनपूर्व नियमित लेने से इस समस्या का निवारण होता है। Sjogren's syndrome, Sicca Syndrome अथवा तत्सम व्याधियों मे मुँह मे लालास्त्राव उत्पन्न नही होता। इसीलिए तीव्र मुखशोष (dryness of mouth) और नेत्रशुष्कता (dryness of eyes) उत्पन्न होती है। मुनक्के का नियमित रूप से दीर्घकालीन सेवन इन लक्षणों मे निश्चितरूप से राहत दिलाता है। रोज रोज सोडा अथवा तत्सम कार्बोनेटेड शीतपेय पीने से, सुपारी मसाला खाने से अन्ननलिका तथा आमाशय (stomach) की अंतर्त्वचा (inner lining) रुक्ष हो जाती है। ऐसे वक्त थोडा भी तीखा खाने से छाती और पेट मे बहोत जलन होती है। कुछ दिनों के बाद तो पाचकस्त्रावों की कमी से भूख लगना भी कम हो जाता है। काले मुनक्कों का सूप अपने स्निग्ध गुण से इन दोनो विकृतियों मे बखूबी काम करता है।

शीतला - मुनक्का शीत गुणात्मक है। धातुगत उष्णता को कम करता है और शरीर मे ठण्डक उत्पन्न करता है। इसीलिए टाइफाइड, मलेरिया, चेचक, डेंग्यू जैसे व्याधियों में व्याधि ठीक होने के पश्चात शरीर में उत्पन्न अतिरिक्त उष्णता के शमन के लिए मुनक्के का सेवनार्थ उपयोग किया जाता है। हाथ-पैरो मे होनेवाली जलन, मूत्रदाह, गुददाह, वीर्यस्खलन के वक्त होनेवाली जलन इन सभी मे मुनक्का शीतलता प्रदान करता है। बुखार की वजह से आँखो मे होनेवाली जलन हो या धूप की वजह से होनेवाली जलन हो-दोनो मे मुनक्का अच्छा काम करता है।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव ४४४३०३, महाराष्ट्र, भारत

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