स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 29

इसबगोल - आवश्यक / अनावश्यक?

इसबगोल - आवश्यक / अनावश्यक?

Isabgol - Beneficial or Harmful

कब्ज यह एक बहोत ही छोटासा व्याधी है। परंतु छोटा होने के बावजूद भी विश्वव्यापी है। वस्तुतः कब्ज एक अवस्था है, न कि कोई स्वतंत्र व्याधी। गलत आहारविहार के कारण यह अवस्था उत्पन्न होती है। परंतु यही अवस्था अगर दीर्घकाल तक बनी रहे, तब ही व्याधि स्वरुप मे परिवर्तित हो जाती है। फिर लोग इसके निवारण के लिए तरह तरह के उपाय आजमाना शुरू कर देते है, जिनमे से 90% उपाय से वैद्यकीय सलाह के बिना किये जाते है। टीवी चैनल, समाचार पत्र-पत्रिका या इंटरनेट से कोई नुस्खा पढकर लोग उसका उपयोग करना शुरू कर देते है। इसबगोल भी इसी व्यवस्था का एक सृजनमात्र है। लोग ऐसे ही कही पढकर पेट साफ करने के लिए इसबगोल का सेवन करना शुरू कर देते है।

इसबगोल मुलतः भारतीय औषधी नही है। यह मुलतः अरब देशो से आयी हुई औषधी है। इसका विशेष प्रयोग मुसलमान हकीम उनकी चिकित्सा मे करते थे। आयुर्वेदीय ग्रन्थों मे कही भी इसबगोल का उल्लेख नही है। भारत मे मुगलकाल के दरम्यान हकिमों द्वारा इसका प्रचार प्रसार हुआ। तब से भारतीय लोग इसका उपयोग करने लगे है। आजकल आयुर्वेद के नाम से स्थापित हुई हर्बल कंपनियाँ इसबगोल के कल्प (formulation) बनाकर बाजार मे बेच रहे है।

इसबगोल की जो पावडर आजकल बाजार मे मिलती है वह उसके बीजों के छिलकों का चूर्ण होता है, जिसे हम सामान्य भाषा मे भुँसा के नाम से भी जानते है। यह भुँसा रूपी पावडर सेवन करने के बाद बडी आँत (large intestine) मे जाकर, वहाँ उपस्थित पानी सोखकर फूल जाता है। चिपचिपा, लसदार, लुआबवाला हो जाता है। यह लुआब बकरी के मिंगणी जैसा शुष्क मल भी गिला कर देता है, जिससे कुछ समय पश्चात् सूखा हुआ मल भी फूल जाता है। इसबगोल और मल दोनो के फूलने के कारण एक बडा आकारमान बडी आँत मे तैयार हो जाता है, जो मलाशय मे जाकर मलाशय की दीवारो पर तनाव (Stretching) उत्पन्न करता है। यह तनाव ही मस्तिष्क द्वारा मलत्याग की प्रेरणा उत्पन्न करता है और उसके बाद ही उस व्यक्ती को मलत्याग की इच्छा होती है। मतलब इसबगोल स्वत: मलप्रवृत्तिकारक नही है। यह सिर्फ प्रेरक है।

तला हुआ खाना, मटर, मेथी, चने के व्यंजन खाना ऐसे कुछ विशिष्ट कारणों से तथा जबरदस्ती संडास रोकने की आदत के कारण जब मल अत्यंत रुक्ष हो जाता है, तभी एक-दो बार इसबगोल का सेवन किया जा सकता है। परंतु रोज रोज इसबगोल का सेवन (उससे उत्पन्न होनेवाले लुआब की वजह से) पाचनसंस्थान को दुर्बल कर देता है। पश्चात आम उत्पन्न होकर विकृति और बढने लगती है। परिणामतः आमवात, प्रवाहिका, ग्रहणी, प्रतिश्याय जैसे व्याधी उत्पन्न होने की संभावना बढती है और अगर यह व्याधियाँ पहले से ही अस्तित्व में हो तो उन्हें बढ़ाता है। कब्ज तो और ज्यादा बढकर अपनी चरमसीमा पर पहुँचता है जो बाद मे उदावर्तजन्य मनोविकारों मे भी परिवर्तित हो सकता है। यह लुआब बडे आँत की दीवारे मे चिपकता है, जिससे छुटकारा पाने की कोशिश में बडी आँत की दीवारों पर व्रण उत्पन्न होते है। इसीलिए इसबगोल जैसे पेट साफ करनेवाली औषधों का बिना वैद्यकीय सलाह के सेवन नही करना चाहिए। अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव ४४४३०३, महाराष्ट्र, भारत

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