स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 31

वातविकार - कालत्व और अकालत्व

वातविकार - कालत्व और अकालत्व

Rheumatological Disorders - Proper Timing & Its Prematurity

वातविकार अर्थात बढ़े हुए वातदोष की वजह से मनुष्य शरीर मे निर्माण होनेवाली व्याधियाँ। संधिवात (Arthritis), गृध्रसी (Sciatica), पृष्ठवंश के विकार (Spinal Cord Disorders), मन्यास्तंभ (Cervical Spondylitis) पृष्ठग्रह (Thoracic Spine Arthritis), त्रिकग्रह (Lumber spondylitis) ये सभी व्याधियाँ वातविकारों के अंतर्गत आते है। वातविकार प्राचीन काल मे भी अस्तित्व में थे और आज भी अस्तित्व मं् है। प्राचीन काल के समय उनकी उत्पति के कारण अलग थे और आज भी पहले से अलग ही है फिर भी वातविकारों का अस्तित्व तथा तीव्रता पहले जितनी ही है। या यूँ कह सकते है कि पहले से ज्यादा है। कुछ व्याधियाँ जीवनशैली में जैसे बदलाव आते है उस के अनुसार अपना स्वरूप भी बदलती है। परंतु वातव्यधियों का ऐसा नही है। वातव्यधियों के सिर्फ उत्पत्ति के कारण बदले है, स्वरूप नही। पहले और आज में फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले वातविकार वृद्धावस्था में ही उत्पन्न होते थे और आज तो उम्र की कोई मर्यादा ही नही रही। 10 साल का बच्चा हो, 20 साल का युवक हो या 40 की उम्रवाला आदमी हो, वातविकार सबमे समान रूप से पाए जाते है। इसका कारण है - पाश्च्यात्य लोगों से उधार की ली हुई जीवनशैली तथा उनका अंधानुकरण।

आयुर्वेद में जन्म के पहले दिन से ही स्नेह का सेवन (सुवर्णप्राशन के रूप में) बताया है। उसके बाद तो दैनिक जीवन मे अलग अलग प्रकार से स्नेह का अंतर्भाव किया गया है। रोज सुबह उठने के बाद नहाने के पहले अभ्यंग अर्थात पूरे शरीर की मालिश करने के लिए बताया है। उसके बाद नस्य के अंतर्गत नाक में तेल डालने का विधान है। दैनिक आहार में अनिवार्यतः घी होना ही चाहिए। ये सभी बातें दैनिक क्रियाकलाप में समाहित की गयी है। इसका मतलब शरीर व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए तथा प्रत्येक क्षण में होनेवाले क्षय से शरीर को बचाने के लिए स्नेह की शरीर को अत्यंत आवश्यकता रहती है। इसीलिए भारतीय आहार परम्पराओ में घी तेल खाने का पहले से प्रचार रहा है। किसी भी व्यक्ति की ताकत को उसके घी खाने - पीने से जोड़ा जाता था। परंतु स्वातंत्र्योत्तर काल मे यह क्रमशः लुप्त हो गया। हम भारतीय कम और अंग्रेज ज्यादा बन गए। पाश्चिमात्यों की जीरो कोलेस्ट्रॉल वाली गलत संकल्पना को हमने ऐसे आत्मसात कर लिया कि मानो घी-तैल हमारा जानी दुश्मन ही है। पुरुषों ने हृदय की रक्तवाहिनियाँ अवरुद्ध हो जाएगी इस डर से घी खाना छोड़ दिया, तो महिलाओंने वजन बढ़ेगा इस डर से।

कोई भी मशीन - यंत्र सुचारू रूप से चलने के लिए उसको समय समय पर ग्रीस या तेल डालकर उसकी कार्यक्षमता बढ़ाई जाती है। जिसे आजकल की भाषा मे सर्विसिंग करना ऐसा बोला जाता है। अब मशीन तो ठहरी निर्जीव फिर भी उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए अगर स्नेह की परम आवश्यकता रहती है तो मनुष्य का शरीर जीरो कोलेस्ट्रॉल की संकल्पना से कैसे चलेगा?
शरीर व्यापार सुखमय हो इसके लिए जहाँ आयुर्वेद के आचार्यों ने रोज रोज शरीर मे तैल डालने पर जोर दिया है, वहाँ अगर पूरे वर्ष के दरम्यान सिर्फ एक - दो बार ही अगर तैल डाला जाए तो शरीर मे वातविकार नही होंगे तो क्या होगा?

जीरो कोलेस्ट्रॉल की संकल्पना ने भारतीयों के आहार से और सामाजिक संबंधों से भी स्नेह का हरण कर लिया है। 10-20 की उम्र में जब शरीर तेजी से बढ़ता होता है तब बढ़ते हुए शरीर को स्नेह (घी, तैल) की परम आवश्यकता होती है। परंतु उम्र के इसी शिखर पर इन बच्चों के माँ-बाप बिना किसी कारण के स्नेह के डर का हौआ खड़ा कर आहार से स्नेह वर्ज्य कर देते है या फिर कान्वेंट में पढ़नेवाले बच्चें खुद अपनी अंग्रेजी सोच के चलते अन्धानुकरणवश स्नेह त्याग देते है। इसीलिए आजकल के कच्चे बच्चे भी बूढ़ों जैसे सफेद बाल और बिलौरी काँच के चश्मे पहने हुए दिखते है। जैसे भवन निर्माण में पानी का बड़ा महत्व रहता है, वैसे ही शरीर निर्माण तथा शरीर के रखरखाव में स्नेह की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। रसधातु से लेकर शुक्रधातु तक प्रत्येक धातु में स्नेह की स्निग्धता रहती ही है। मतलब धातुओं को दृढ़, बलवान, व्याधिसह (Immune to the frequent attacks of diseases) अगर बनाना है तो घी-तैल सेवन अत्यावश्यक है। परंतु आज इसी बात का अभाव है। परिणामतः शरीर मे वातदोष की वृद्धि होकर शरीर के आधारस्वरूप धातुओं में क्षय (Degeneration) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसीलिए 15 से 20 साल के बच्चों के जोड़ो (Joints) से भी बूढों जैसी कट-कट की आवाज सुनाई देती है। Slipped Disc, Disc Dessication, Disc Bulging, Exiting Nerve Compression ये सब विकार वृद्धावस्था के है, फिर भी आजकल ये विकार 20 -25 साल के युवकों में बहुतायत प्रमाण में पाए जाते है। कुछ युवक तो 20-25 की उम्र में ही इन व्याधियों की वजह से विकलांग बन जाते है। जब तक शरीर रूपी इंजन को उचित समय पर स्नेह की आपूर्ति नही की जाएगी, तब तक वातविकार उत्पन्न होते ही रहेंगे।

सम्प्रति कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ने के मिथ्याप्रचार से ही लोगों ने स्नेहसेवन बंद कर दिया है। ऊपर से जो भी स्नेह अर्थात घी तैल बाजार में मिलते है वो विकृत स्वरूप के है। आदर्शरूप में घी मख्खन से बनाया हुआ होना चाहिए, जो उचित अग्निसंस्कार की वजह से शरीर मे सरलता से सात्म्य हो जाता है। तैल लकड़ी की घाणी से निकाल हुआ होना चाहिए। परंतु वास्तविकता इससे एकदम विरुद्ध है। बाजार में जो तथाकथित घी मिलता है, वह मूलतः घी न होकर अर्धपक्व स्नेह है जिसे इंग्लिश में Butter Oil या Clarified Butter कहा जाता है और तैल की तो यह हालत है कि बस भगवान ही बचाए। आज का व्यापारिक पद्धति से बनाया हुआ तैल उसके प्राकृतिक गुणधर्मों से कोसो दूर है। इसीलिए ऐसे घी और तैल का सेवन शारीर धातुओं को आधारभूत होने की बजाए क्षयकारक (Degenerative), नुकसानदेह होता है और यही आज की युवा पीढ़ी में वातविकार बढ़ाने का मुख्य कारण है। इसीलिये सन्धिवातादि वातविकारों से अगर बचना है तो निम्नलिखीत उपायों पर अमल करना चाहिए।

वातव्याधियों की रोकथाम के उपाय -

१) रोज के आहार में घर पर बनाये हुए घी का अथवा घाणी से निकाले हुए तिल तेल का खाने में उपयोग करे। नारियल तेल का भी उपयोग खाने में किया जा सकता है। सिर्फ प्रचुर घी या तैल वाला खाना खाने के बीच बीच या तुरंत बाद मे ठंडा पानी न पिए। पीने में गरम पानी का ही उपयोग करे।
२) रोज नहाने से पहले तिल तैल, नारियल तैल या सरसो के तैल से अभ्यंग करे एवं नस्य, गण्डूष , कर्णपूरण जैसे उपक्रमों को दिनचर्या में अपनाए। समयाभाव से यह सभी उपक्रम करना संभव न हो तो सप्ताह मे एक दिन कभी भी उपरोक्त सभी उपक्रमों को आचरण में लाए।
३) महीने में एक बार स्वामीआयुर्वेद सिद्ध एरंड तैल से सद्योविरेचन कराए।
४) सर्व प्रकार के वातव्याधियों मे स्वामीआयुर्वेद सिद्ध एरंड तैल उत्कृष्ट कार्य करता है। इसीलिए किसी भी तज्ञ आयुर्वेद डॉक्टर की सलाहनुसार सिद्ध एरंड तैल का वेदना प्रशमन के लिए उपयोग करे।अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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