स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 36

दिनचर्या भाग 2 - शौचविधी

दिनचर्या - भाग 2

शौचविधी

शौचविधी एक अत्यंत सामान्य प्रक्रिया है। इसीलिए शौचविधी का आयुर्वेदीय संहिताओं मे वर्णन नही मिलता। परंतु हमारे ऋषिमुनियों को क्या पता की आनेवाली पीढी को शौचक्रिया भी समझानी पडेगी।

सुबह उठने के बाद तुरंत शौचवेग आये ऐसी प्रत्येक भारतीय की इच्छा होती है। परंतु बहोत ही कम लोगों को ऐसा सौभाग्य प्राप्त होता है। अन्य लोग जिन्हे सहजता से मलवेग नहीं आता वे जोर लगाकर जबरदस्ती मलप्रवर्तन करने की कोशिश करते है। इनसे से कुछ माता-बहने होती है, जिन्हे ऑफिस मे शौचालय जाने की शर्म आती है। तो कुछ लोग ऑफिस का शौचालय गंदा होता है इसीलिए सुबह ही जोर लगाकर दो-तीन बार करने की कोशिश करते है। परंतु यह जबरदस्ती कुछ दिनों के बाद हर्निया (Hernia), आंत्रशैथिल्य जैसे व्याधियों मे परिवर्तित होती है। बाकी बचे लोग नींद से उठने के बाद तुरंत संडास आये इसके लिए तरह तरह के तिकडम अपनाते है। कोई तमाखू खाता है, तो कोई मसाला। कोई बीडी फूँकता है, तो कोई सिगारेट। जिन्हें ऐसे व्यसन अच्छे नही लगते, वो गरमागरम चाय पीते है। परंतु अब प्रश्न यह भी निर्माण होता है की जब तमाखू, मसाला,बीडी, सिगारेट या चाय भारत मे नही थे, तब क्या लोग संडास ही नही जाते थे? उन्हे क्यूँ इस तरह के तथाकथित प्रेरकों (stimulators) की जरूरत नही पड़ती थी।

कारण है - उनके सुबह उठने का समय - ब्राम्ह मुहूर्त

पहले लोग प्रातःकाल मे ब्राम्ह मुहूर्त मे उठा करते थे। ब्राम्ह मुहूर्त मे उठने का फायदा यह रहता है की जैविक घडी (Biological Clock) के अनुसार यह काल वातदोष के प्रवर्तन (Activities) का काल होता है। इसीलिए ब्राम्ह मुहूर्त मे उठते ही शौचवेग आता है और ऐसा होना स्वस्थता का लक्षण माना जाता है। ब्राम्ह मुहूर्त मे उठते ही शौचवेग आना मतलब - आपका शरीर एवं शरीर को नियंत्रीत करनेवाली जैविक घडी मे सामंजस्य है। सुबह 6 बजे के आसपास जैविक घडी के अनुसार कफदोष का काल शुरू होता है। इस कफकाल मे नींद से उठने पर वातप्रवर्तन नही होता। क्योंकि कफदोष वात का प्रवर्तन (activities) धीमा कर देता है। इसीलिए ब्राम्ह मुहूर्त टलने के बाद उठनेवाले लोगों को मलप्रवर्तन (संडास) के लिए उपर लिखे तिकड़मों का सहारा लेना पडता है, जो दोगुना महंगा पडता है। एक तो उस व्यसन के दुष्परिणाम भुगतने पडते है, दूसरा हम शरीर की प्राकृतिक क्रियाओं को ऐसे कृत्रिम प्रेरकों के गुलाम बना देते है। शौचक्रिया, वैसे तो एक अत्यंत सहज क्रिया है।

परंतु आजकल इसका भी पश्चिमीकरण होने की वजह से कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
1. शौचविधी उत्कटासन मे ही करना चाहिए। उत्कटासन को लोकभाषा मे उकंडू बैठना ऐसा बोला जाता है। पश्चिमी कमोड (प्रसाधन) मे उत्कटासन मे बैठा नही जा सकता। उत्कटासन मे बैठने से जांघो का पेडू (Lower abdomen, Pelvis) पर जो दबाव पडता है, उसकी वजह से मलविसर्जन क्रिया आसानी से होती है। पश्चिमी कमोड मे ऐसा संभव नही होता।

2. कभी कभी कुछ व्याधियों मे मल के साथ रक्त भी गिरता है। मतलब मल के साथ रक्त गिरता हुआ दिखेगा या फिर मल काले वर्ण का दिखेगा। परंतु यह 'दिखना' सिर्फ देसी कमोड मे संभव है। पश्चिमी कमोड के उपयोग से ऐसी बाते पता नही चलती। मलाशय के कैन्सर मे तो पहला लक्षण ही रक्तस्त्राव है। पश्चिमी कमोड की वजह से ऐसा रक्तस्त्राव तो ध्यान मे आना मुश्किल ही है और जब ध्यान मे आए, शायद तब तक देरी हो चुकी होती है। इसीलिए संभव हो तब तक पश्चिमी कमोड का उपयोग टालना चाहिए।
परन्तु आजकल तो आधुनिक घरों के शौचालयों मे पश्चिमी कमोड ही लगाया हुआ होता है। उसे निकालकर देसी कमोड लगाना कभी कभी व्यवहार्य (Practical) नही होता। ऐसे वक्त पश्चिमी कमोड पर बैठते वक्त पैरो के नीचे कम से कम 1 फीट ऊँचा स्टूल लेना चाहिए जिससे पेडू पर थोडा दबाव बने और मलप्रवर्तन सुखकर हो। हालाँकि इन बदलावों से पूर्ण तो नही लेकिन अंशतः ही उद्देश्य साध्य होता ही है। संधीवात (Arthritis), आमवात (Rheumatoid arthritis), वंक्षणसंधी के व्याधी (Disorders of Hip Joint) या फ्रैक्चर (Fracture) के कारण अर्थात जिन व्याधियोमे संधीयों का आकुंचन प्रसारण सहजता से नही हो पाता ऐसे व्याधियों मे पश्चिमी कमोड का उपयोग सुखवाह होता है। परंतु फिर भी संभव हो तो ऐसी स्थिती मे भी पैरो के नीचे कम से कम 5 या 6 इंच का स्टूल रखना ही चाहिए।

3. शौचविधी करते समय साथ मे मोबाईल नही होना चाहिए। क्योंकि इस कार्य मे भी मन की एकाग्रता बहोत जरूरी है। अर्थात शौचालय मे हम कोई तपस्या करने नही जाते फिर भी मनःस्थिति का मलप्रवर्तन पर गहरा असर पडता है। क्षुब्ध या दुःखित मन से मलप्रवर्तन सम्यक (Proper) नही हो सकता। इसीलिए शौचविधी भी शांती से ही संपन्न करनी चाहिए।

4. शौचक्रिया के बाद गुदप्रक्षालन कुनकुने गर्म पानी से करना चाहिए। परन्तु ऐसा तो हर वक्त सब के लिए संभव नहीं है पर जिन्हे बवासीर, भगंदर, फिशर जैसी गुदगत व्याधियां है उन लोगो को ऐसा प्रयास करना चाहिए। कुछ लोग जरा ज्यादा ही स्वच्छता प्रिय होते है जो गुदप्रक्षालन के लिए साबुन का उपयोग करते है। साबुन का उपयोग गुद को रुक्ष और शुष्क बना देता है। साबुन का बारबार उपयोग फिशर उत्पन्न करता है तथा बवासीर की पूर्वपीठिका तैयार करता है। इसीलिए गुदप्रक्षालन के लिए साबुन का उपयोग करने से बचे।

5. सामान्यतः दिन में २ बार शौच को जाना चाहिए। सुबह एक बार और रात को सोने से पहले दूसरी बार। मलाशय रिक्त होने की वजह से नींद भी अच्छी आती है और शाम को ग्रहण किये हुए आहार का पाचन भी सुलभ होता है।

शौचविधी जैसी सहज सामान्य प्रक्रियाएं भी आजकल हमने आधुनिकता के नाम पर ऐसी कर दी है की जो शरीर के लिए हितकर होने की बजाए रोगनिर्मिति का एक कारण बन गई है। अतएव उपरोक्त निर्देशों का पालन करे एवं शरीर को एक व्याधी निर्माण करनेवाले कारण से दूर रखे। अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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