स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 37

दिनचर्या भाग 3 - दन्तधावनम

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 37

दिनचर्या - भाग 3
दन्तधावनम - Brushing The Teeth

दंतधावन मतलब दाँत साफ करना, दाँत घिसना। दंतधावन यह आयुर्वेदीय ग्रंथोंद्वारा वर्णित दिनचर्या का तीसरा सोपान है। शौचविधी पूर्ण होने के बाद दंतधावन किया जाता है। प्राचीन काल मे दाँत साफ करने के लिए शास्त्र की सलाहनुसार दातौन या मंजन का उपयोग किया जाता था। वैसे आज के आधुनिक काल मे भी कुछ लोग दातौन तथा मंजन का प्रयोग तो करते ही है, परंतु टूथपेस्ट से दाँत साफ करनेवालों की संख्या की तुलना मे इन लोगों की संख्या नगण्य है। सुबह उठने के बाद पहले दंतधावन करना चाहिए। क्योंकि दंतधावन करते समय मसूडों पर मंजन मलने से मलोत्सर्ग की प्रेरणा उत्पन्न होती है ऐसा कुछ विद्वानों का मानना है। परंतु वास्तविकता इस तर्क के साथ मेल नही खाती इसीलिए अन्य विद्वानों ने अभी इसका समर्थन नही किया है। प्रत्यक्ष आयुर्वेद भी मलोत्सर्ग के बाद ही दंतधावन की सलाह देता है। सम्प्रति दंतधावन के लिए ब्रश और टूथपेस्ट का उपयोग किया जाता है। ब्रश नायलॉन प्लास्टिक के रोये से बनता है। ये प्लास्टिक के रोये अगर नर्म, मुलायम है, तो दाँत अच्छी तरह से साफ किये जा सकते है और मसूडों को भी हलकी हलकी मालिश करते हुए मैल की परत को साफ किया जा सकता है। परंतु ब्रश के रोये अगर कठोर रहे, तो मसूडों को हानी भी पहुँचा सकते है। इसीलिए रोये चाहे नर्म हो या कठोर, दाँत साफ करने से पहले संभव हो तो ब्रश को 2-3 मिनीट गरम पानी मे डुबोकर रखना चाहिए, जिससे रोये और नर्म बनकर मसूडों को बिना आघात पहुँचाये सुगमता से मुख साफ किया जा सकता है।

ब्रश के साथ टूथपेस्ट का उपयोग किया जाता है और टूथपेस्ट सोडियम लॉरेथ सल्फेट, ट्रायक्लोसन जैसे तरह तरह के रसायनों से बनी होती है। सोडियम लॉरेथ सल्फेट का उपयोग बडी बडी औद्योगिक कंपनीयों मे फर्श पे पडा तैल तथा मशीनों का ग्रीस साफ करने के लिए किया जाता है। यह सोडियम लॉरेथ सल्फेट पूरी चिकनाहट को दूर कर देता है। इसी सोडियम लॉरेथ सल्फेट से झाग भी बनता है और आजकल ब्रश करते समय अगर मुँह मे झाग हुआ नही तो लोगों को ब्रश करने का मजा ही नही आता। परंतु यही मजा बाद मे सजा मे कब परिवर्तित हुई यह पता भी नही चलता। क्योंकि यही सोडियम लॉरेथ सल्फेट मसूडों से स्निग्धता का हरण कर अतिरुक्षता उत्पन्न कर देता है। यह रुक्षता मसूडों की व्याधी प्रतिकारक्षमता कम कर देती है। इसीलिए टूथपेस्ट का उपयोग करनेवाली आज की पीढी मसूडों के तरह तरह के विकारों की शिकार हुई है।

टूथपेस्ट मे ट्रायक्लोसन नाम का भी एक अन्य रसायन होता है, जो ब्रश करते समय मसूडों से अत्यल्प मात्रा मे शरीर मे शोषित होता है। यह ट्रायक्लोसन शरीर की अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों के (endocrine glands) विशेषतः थायराइड ग्रन्थी के सिग्नलिंग मे गडबड उत्पन्न करता है तथा रोगप्रतिकारक शक्ति को कम करता है। ट्रायक्लोसन युक्त टूथपेस्ट का बचपन से ही उपयोग करनेवाले बच्चों की व्याधिप्रतिकारक क्षमता का अच्छा विकास नही हो पाता। इसीलिए ऐसे बच्चों मे दमा (Asthma), त्वचारोग (Eczema) या तरह तरह की एलर्जीया उत्पन्न होती है। इसीलिए दाँत साफ करने के लिए टूथपेस्ट का उपयोग नही करना चाहिए।
आयुर्वेद मे दाँत साफ करने के लिए दातौन का उपयोग करने की सलाह दी है। दातौन मतलब दाँत साफ करने के लिए उपयोगी बताये हुए वृक्षों की लकडी। यह लकडी गीली ही होनी चाहिए, सूखी नही। लम्बाई मे कम से कम 12 अंगुल होना चाहिए क्योंकि दाँत साफ करने के बाद दातौन को ही चीर कर जीभ साफ की जाती है। इस लकडी के अग्रभाग को दाँतो से चबाकर अथवा कूटकर मुलायम कर लेना चाहिए। नही तो उसके खुरदरेपन की वजह से उसकी रगड मसूडों मे लग सकती है। दातौन का स्वाद (रस) कसैला (बबूल के जैसा) या तीखा (लौंग के जैसा) या कडवा (नीम के जैसा) होना चाहिए। दातौन की मोटाई हाथ की सबसे छोटी उँगली (करांगुली) के जितनी होनी चाहिए, ताकि चबाकर उससे ब्रश जैसा कूचा बनाया जा सके। ऐसे गुणों से युक्त दातौन को लेकर दाँतो को इस प्रकार घिसे जिससे दाँत स्वच्छ हो जाये और मसूडों पर खरोश न लगे।

दातौन को लेकर कूची( Brush) मे शहद मिलाकर मंजन के साथ प्रत्येक दाँत घिसने की भी एक अन्य पद्धती का शास्त्र मे वर्णन मिलता है अथवा अकेले मंजन को शहद मे मिलाकर दाँत और मसूडों पर मला जा सकता है। दंतहर्ष (Sensitivity of teeth) मे शहद की यह पद्धती अच्छा काम करती है।

दातौन प्रातःकाल एवं सायंकाल दोनो समय करने का विधान है। दातौन का स्वाद मीठा, नमकीन और खट्टा नही होना चाहिए। परंतु आजकल अधिकतर उपयोग मे लायी जानेवाली टूथपेस्ट तो स्वाद मे मीठी ही होती है। कुछ टूथपेस्ट और मंजन मे तो नमक का भी उपयोग किया जाता है, जिसका शास्त्र मे स्पष्टता निषेध ही किया है।

दातौन के लिए उपयोगी काष्ठ : बरगद, खैर, अर्जुन, निम्ब, बबूल

दातौन वैसे तो एक सामान्य प्रक्रिया है, फिर भी कुछ व्याधियों मे उसका निषेध किया है -
1. जैसे खाया हुआ ठीक से पाचन न हुआ हो तब,
2. उलटियाँ हो रही हो तब,
3. दमा (Asthama) का अटैक चालू हो तब,
4. जिसे सतत खाँसी आ रही हो ऐसे व्यक्ति को,
5. बुखार हो तब,
6. मुँह का लकवा,
7. बहोत और वारंवार प्यास लगती हो तब,
8. मुँह आया हो तब, किसी को हृदयरोग हो,
9. आँख, सिर और कान से संबंधित कोई भी व्याधी हो तब दातौन नही करना चाहिए।

उपरोक्त सभी विवरण को पढ़कर दातौन की उपयोगिता आपके समझ मे आई होगी। इसीलिए आज से ही टूथपेस्ट का त्याग कर, दातौन अथवा मंजन से दाँत साफ करने का संकल्प ले और दाँतो की सुरक्षा करे। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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