स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 38

दिनचर्या भाग 4 - गण्डूष

गण्डूष

Oil Pulling

गण्डूष यह दंतधावन के बाद किया जानेवाला दिनचर्या का चौथा उपक्रम है। गण्डूष यह संस्कृत शब्द है। गण्डूष अर्थात मुँह मे सिर्फ तैल, औषधसिद्ध तैल (Medicated oil), काढा (Decoction) या अन्य कोई भी उपयुक्त द्रव पदार्थ (जैसे गोमूत्र या शिवाम्बु) एक विशीष्ट समय के लिए धारण करना। गण्डूष इस दिनचर्या उपक्रम को तो छोड़ो, गण्डूष शब्द को भी आजकल कोई नही जानता इतना इस उपक्रम का जनमानस को विस्मरण हुआ है।

गण्डूष उपक्रम मे मुँह में धारण किए हुए द्रव्य (प्रवाही स्वरूप, Liquid) को इधर उधर घुमाया नही जाता, अपितु स्थिर रखा जाता है, ताकी यह द्रव्य मुख मे स्थित दाँत, जीभ, मसूडे, तालु इन सब के समान (uniformly) संपर्क मे आये। जिस प्रवाही द्रव्य से गण्डूष करना है, उसे मुँह मे धारण करने से पहले आवश्यकतानुसार गरम या ठण्डा प्रयुक्त किया जाता है। मुँह मे धारण करने के बाद उस द्रवपदार्थ को मुँह मे तब तक रोके रखना चाहिए जब तक आँख और नाक से पानी आना शुरू न हो जाये। परंतु वास्तव मे ऐसा पानी आने के लिए कम से कम 45 मिनीट तो रखना ही पडता है और यही तो आजकल की मुख्य समस्या है। क्योंकि इतना समय ही नही है किसी के पास। फिर भी उत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए कम से कम 15 से 30 मिनीट तक तो गण्डूष करना ही चाहिए। चूँकी यह समय भी थोडा ज्यादा है, तो इतने समय मे तो गाल थोडे दुखने लगते है, परंतु धारण किया हुआ द्रवपदार्थ थुँक देने के बाद ही गालों का दुखना तुरंत कम हो जाता है। गण्डूष करने के बाद गरम पानी से कुल्ले करके मुँह साफ करना चाहिए। क्वाथ से गण्डूष किया हो तो मुँह तुरंत साफ हो जाता है। तैल से किया हो, तो थोडा समय लगता है, परंतु हो जाता है। तैल का अंश नही रहता।

गण्डूष आवश्यकतानुसार दिन मे एक, दो या फिर वैद्यजीकी सलाहनुसार किया जा सकता है। दात, मसूढे, जीभ, स्वादांकुर इनके सभी विकारों मे गण्डूष रामबाण की तरह काम करता है। दन्तक्षय (Dental carries) दन्तहर्ष (sensitive teeth) पायोरिया, मसुडो का फूलना, मसूडों से खून निकलना, मुँह का बारबार सुखना, अकाल मे ही दाँतो का हिलना, मुँह आना, तालु पर जख्म होना इन व्याधियों मे गण्डूष अच्छा काम करता है। इतना ही नही मुँह का कैंसर, जीभ का कैंसर ऐसे व्याधियों मे भी गण्डूष के उत्साहवर्धक परिणाम पाये गये है। पर सिर्फ 1 या 2 दिन गण्डूष करने से नही बल्कि नियमीत गण्डूष का अभ्यास (Practice) करने से ही ये परिणाम मिल सकते है। नियमीत अर्थात कम से कम 60 दिनों तक। परंतु आजकल दौडधूप की जिंदगी मे गण्डूष स्वास्थ्यानुवर्तन के लिए रोज रोज करना संभव नही, ऐसे वक्त कम से कम सप्ताह के अंत मे एक या दो दिन तो जरूर किया ही जा सकता है। ऑफिस जाने के लिए अपडाऊन करनेवाले सज्जन बस या लोकल ट्रेन मे बैठे बैठे भी गण्डूष कर सकते है। आजकल लोग सुबह उठते ही मोबाइल देखने मे व्यस्त हो जाते है, गण्डूष के लिए इस समय का भी सदुपयोग किया जाता है या फिर शौचनिवृत्ति के समय बैठे बैठे भी गण्डूष किया जा सकता है। गण्डूष लेटकर या सोकर नही करना चाहिए। मुँह का स्वास्थ्य बरकरार रखने के लिए गण्डूष सुबह सुबह दंतधावन के बाद तुरंत करना चाहिए परंतु व्याधिकाल में तो गण्डूष कभी भी और कही भी किया जा सकता है।

गण्डूष अगर नियमीत रूप से किया जाये, तो भारत मे दाँत, जीभ और मुँह के विकार खोजने पर भी नही मिलेंगे। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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