स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 40

दिनचर्या भाग 6 - व्यायाम

दिनचर्या अनुक्रम में अभ्यंग के बाद व्यायाम का क्रम आता है। शरीर निरोगी, सुदृढ और मजबूत बनाये रखने मे व्यायाम की अहम भूमिका होती है। नियमित व्यायाम करने से शरीर की कार्यक्षमता बढती है और काम करते वक्त थकान का अनुभव नही होता। इसलिए आयुर्वेद के ऋषि-मुनीयों ने व्यायाम को दिनचर्या मे स्थान दिया है। व्यायाम बिना अभ्यंग के नही करना चाहिए क्योंकि व्यायाम करने से वात बढता है और अभ्यंग करके व्यायाम करने से वात बढ़ता नही, बल्कि नियंत्रण मे रहता है और मांसपेशियों का पोषण भी होता है। आजकल की पीढ़ी हीरो की बॉडी देखके व्यायाम करने के लिए प्रेरित होती है। पर इनका व्यायाम ये हमेशा 'कल' से शुरू होता है और शुरू हुआ तो भी आलस के कारण १०-१५ दिनों में ही सिमट जाता है।

आइये व्यायाम के संदर्भ में आयुर्वेद के विचारो पर चर्चा करते है।

1) व्यायाम का शास्त्रीय अर्थ क्या है? व्यायाम कितना करना चाहिए?

आयुर्वेद के अनुसार शरीर की जो चेष्टा (efforts) शरीर मे स्थिरता (दृढता) लाने के लिए एवम बल (ताकद) को बढाने के लिए की जाती है उसका नाम व्यायाम है। यह स्थिरता तथा ताकद दीर्घानुबंधी होनी चाहिए मतलब जो मनुष्य के आखरी सांस तक उसका साथ दे। परंतु अवलोकन ऐसा है की जितने पहलवान उनकी युवावस्था मे एक मोटरसायकिल तक उठाने की क्षमता रखते है, वो उनके बुढेपन मे शरीर पर बैठा मच्छर या मक्खी भी नही उठा सकते। इसका एकमात्र कारण है - व्यायाम का अतिरेक करना। कुछ तरुण रातोंरात दारासिंह, सनी देओल जैसी बॉडी बनाने के लिए अपने शरीर की क्षमता से ज्यादा व्यायाम करते है। इस अतिरेक से युवावस्था होने के कारण शरीर घुमावदार जरूर दिखता है परंतु मांसपेशियों के आकार मे विकृत वृद्धि (hypertrophy) होती है, जो युवावस्था ढलने के बाद मांसपेशियों के निष्क्रियत्व मे बदल जाती है। इसलिए जिस पहलवान की ताकत व चपलता को आप उसके युवावस्था मे देखते हो उससे पूर्ण विपरीत स्थिती उसके वृद्धावस्था मे होती है। तारुण्यावस्था मे व्यायाम के अतिरेक की वजह से मांसपेशियों का स्थितिस्थापकत्व भी नष्ट हो जाता है। इसलिए आयुर्वेद कहता है - मात्रया तां समाचरेत। अर्थात व्यायाम भी मात्रा मे ही करे। मात्रा मतलब अपने शरीर की क्षमता (capacity), जिसे आयुर्वेद 'बलार्ध' के नाम से भी जानता है।

2) परंतु अब अपने शरीर की क्षमता को कैसे पहचाने?

व्यायाम करते करते जब सांस फूलने लगे, पसीना आने लगे या मुँह सूखने लगे तब समझना चाहिये कि शरीर का आधा बल समाप्त हो चूँका है। तभी व्यायाम करना बंद कर देना चाहिये। परंतु यदि आप फिर भी दुराग्रह करके मतलब शरीर द्वारा थकने के संकेतो को दुर्लक्षित करके व्यायाम करते रहे, तो व्यायाम से प्राप्त होनेवाले लाभों के आप अधिकारी तो रहोगे नही, बल्कि शरीर की हानी ही होगी।

3) व्यायाम का काल :

आयुर्वेदानुसार व्यायाम प्रातःकाल मे ही करना चाहिए और वो भी अभ्यंग करने के बाद ही। परंतु आजकल तो शाम को जिम मे जाकर व्यायाम करने की परिपाटी है। क्योंकि पाश्चात्य देशो मे शाम को ही व्यायाम करने की प्रथा है और पाश्चात्य जैसा करते है, वैसी ही परंपरा का निर्वाह करने मे भारतीय अपनी इतिकर्तव्यता समझते है। फिर हमारा अपना आयुर्वेद ऐसी बातों का विरोध करे तो भी, भारतीयों को कुछ लेना देना नही है।
सायंकाल मे मनुष्य शरीर मे वातदोष बलवान (active) होता है और वातदोष शरीर मे क्षयकरक घटनाओं (Degenerative changes) को बढावा देता है। इसीलिए व्यायाम, जो कि स्वतः वातवर्धक है, शाम को नही करना चाहिए। अन्यथा वात की वृद्धि होकर समयपूर्व ही वातव्याधी होने की संभवनाए ज्यादा बनी रहती है।

4) व्यायाम किसे नही करना चाहिये?

आयुर्वेद मे व्यायाम किसे नही करना चाहिये, इतना सूक्ष्म विचार भी किया हुआ है। जिन लोगो को रक्तधातु से संबंधित व्याधियाँ होती है, जिनका वजन 40 किलो से भी कम है, जिसने अभी अभी खाना खाया हो, जो ज्यादा मैथुन करता हो तथा जिनको सतत चक्कर आ रहे हो ऐसे लोगों को व्यायाम नही करना चाहिये।

5) व्यायाम के लाभ -

नियमित व्यायाम करने से शरीर मे संचित अनावश्यक मेद का पाचन होकर शरीर मे हलकापन एवं फुर्ती उत्पन्न होती है। कितना भी मेहनतवाला काम हो, तो भी सतत काम करने से शरीर नही थकता। शरीर का व्याधीक्षमत्व बढता है, इसलिए व्यक्ती बारबार बीमार नही पडता। भूख तेज होती है। आजकल के व्यवसायों मे मेहनत कम होने की वजह से पाचनसंस्थान के विकार उत्पन्न होते रहे है। किसी को भूख ही नही लगती, किसी को गैसेस ज्यादा होते है तो किसी को पेट ही साफ नही होता। ऐसे वक्त सुबह, उठके किसी खेल के मैदान पर दौड लगानी चाहिए। दौड लगाने से पाचनसंस्थान सबल होकर भूख खुलने लगती है तथा अन्य विकारों का शमन होता है।

6) व्यायाम के बाद क्या करना चाहिये?

व्यायाम करने से शरीर थक जाता है। इसलिए व्यायाम के बाद 15-20 मि शांती से बैठकर आराम करना चाहिए। व्यायाम करने से अगर प्यास लगी हो, तो तुरंत पानी नही पीना चाहिए। व्यायाम की वजह से शरीर का बढ़ा हुआ तापमान थोडा कम हो जाए, फिर पानी पीना चाहिए। व्यायाम पूर्ण करने के 45 मि. बाद स्नान करना चाहिए और स्नान के पश्चात ही अल्पोपहार (Breakfast) ग्रहण करना चाहिए।
अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव ४४४३०३, महाराष्ट्र, भारत

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