स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 42

दिनचर्या भाग 8 - नस्य

दिनचर्या भाग 8 - नस्य Nasal Drops

नाक से औषधि द्रव्य प्रयुक्त करने को आयुर्वेदीय परिभाषा मे 'नस्य' करना कहते है। नस्य के मोटे तौर पर दो प्रकार होते है।
1. दैनिक नस्य
2. पंचकर्मान्तर्गत नस्य

दैनिक नस्य रोज किया जाता है। दैनिक नस्य से आँख, नाक तथा कानों की प्राकृतिक कर्मशक्ति बनी रहती है। सिर के बाल तथा दाढी के बाल सफेद नही होते और न ही गिरते है, अपितु विशेष प्रकार से बढ़ते है। चेहरे पर प्राकृतिक चमक (Glow) आती है। पंचकर्मान्तर्गत नस्य, जब किसी विशिष्ट व्याधी की चिकित्सा करनी हो तब किया जाता है। उदाहरण के लिए गर्दन जकड जाना (Torticollis), सिरदर्द (Headache), मुँह का लकवा (Facial Paralysis), कन्धा जकड़ जाना (Frozen shoulder), जबडा जकड जाना, नाक से सतत पानी बहना (Rhinitis), आधा सिर दुखना, सिर हिलते रहना (Parkinsonism)।

दैनिक नस्य और पंचकर्मान्तर्गत विशेष नस्य की मात्रा में फर्क होता है। दैनिक नस्य की मात्रा कम रहती है लेकिन पंचकर्मान्तर्गत विशेष नस्य की मात्रा ज्यादा रहती है। इसलिए दैनिक नस्य की वजह से कोई उपद्रव नही होता, परंतु विशेष नस्य मे अगर शास्त्रोक्त नियम तथा पद्धती का अनुसरण नही किया तो उपद्रव होते ही है। इसलिए विशेष नस्य सेवन के दरम्यान ज्यादा सावधानी बरतना ही उचित है।

आयुर्वेद मे नस्य करने के लिए अकेला तैल, अकेला घी, औषधसिद्ध तैल या घी, काष्ठाैषधियों का सूक्ष्म चूर्ण, ताजे-हरे औषधियों का स्वरस, काढा, दूध, गोमूत्र, स्वमूत्र इनका व्याधी तथा अवस्थानुसार उपयोग किया जाता है। औषधियाँ जलाकर जो धुआँ उत्पन्न होता है, उसे भी नाक द्वारा ग्रहण करने को धूमनस्य बोला जाता है। अलग अलग व्याधियाँ तथा उन व्याधियों की अवस्था के अनुसार अलग अलग आवश्यक द्रव्यों का प्रयोग नस्य कर्म मे किया जाता है। सम्प्रति तिल का तैल तथा गाय के घी का दैनिक नस्य के लिए उपयोग किया जाता है।
नस्य कर्म गर्दन, गला तथा उसके उपर आनेवाले अवयव जैसे नाक, कान, सिर इनको बल प्रदान करने के लिए तथा उनका स्वास्थ्यरक्षण करने के लिए किया जाता है। दैनिक नस्यकर्म दिन मे 14 बार करने के लिए बताया गया है। इससे यही सिद्ध होता है की गर्दन तथा उसके उपर स्थित रहनेवाले अवयवों को प्रत्येक दिन स्नेह (तैल या घी) कि कितनी ज्यादा मात्रा अपेक्षित होती है और आज हम कितनी बार नस्य करते है? एक बार भी नही। मतलब शरीर के जिस क्षेत्र मे एक ही दिन मे 14 बार तैल अथवा घी डालना होता है, उसमें आजतक हमने कितनी बार तैल-घी डाला है, यह आप सोचो। फिर 12 महीने और सालोंसाल अगर किसी व्यक्ति को सर्दी रहती है, बारबार छीकें आती है, सदैव सिरदर्द होता है, किसी बच्चे को बचपन से ही चष्मा लगता है या किसी के बाल उम्र के 10 वे साल से ही सफेद हुए हो तो उसमे दोष किसका?

गर्दन, गला, नाक, कान, सिर, आँख इन अवयवों मे अगर कोई विकृति उत्पन्न हुई तो उसे ठीक करना थोडा कष्टसाध्य होता है, यह आयुर्वेद को पहले से ही ज्ञात था। इसलिए आयुर्वेद ने रोज नस्य कर्म के द्वारा इन अवयवों की रक्षा करने की सलाह कई सहस्र वर्ष पूर्व ही दी है। फिर भी अगर आप आयुर्वेद की सलाह नही मानोगे और जब कोई व्याधी होगा, तो आयुर्वेद से ठीक नही हुआ ऐसा दूषण अगर आयुर्वेद को दोगे, तो इसमे दोष आपका या आयुर्वेद का?

आजकल 60 साल की उम्र पार करते ही कुछ लोगों को छोटी छोटी बातों का विस्मरण होते देखा जाता है। कोई पार्किन्सन जैसे रोगो से ग्रसित होता है, किसी को सतत चक्कर आते रहते है और सीधा चलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों के ब्रेन का एम.आर.आय अगर आप कराओगे, तो आपको रिपोर्ट मिलेगा की उनका ब्रेन सिकुड गया है और अब इसका कोई ईलाज नही है। किसी किसी सामान्य व्यक्तियों मे भी ब्रेन का सिकुड़ना देखा जाता है। दैनिक नस्य से इस विकृति को शत-प्रतिशत रोका जा सकता है। इसलिए भी शास्त्र या पुराणों मे कभी किसी स्मृतिक्षय वाले वृद्ध का उल्लेख हमने आजतक नही देखा।

नस्य कर्म, चाहे दैनिक हो या विशेष, स्नान के बाद जब गीले बाल और केशभूमि (scalp) सुख जाये तब करना चाहिए। गीले बाल या गीला सिर हो तो ऐसी स्थिती मे नस्य नही करना चाहिए ऐसा करने से सर्दी तथा सिरदर्द होने की अधिकतम संभावना रहती है। इसलिए या तो सिर से पानी लेके स्नान नही करना चाहिए या तो स्नान के बाद जब तक बाल और केशभूमि सूख नही जाती, तब तक नस्य नही करना चाहिए।

विशेष नस्य की प्रक्रिया मे प्रधान कर्म (main procedure) के पहले और बाद मे दोनो वक्त सेक-मालिश करना आवश्यक होता है। दैनिक नस्य के वक्त सेक-मालिश की आवश्यकता नही होती। फिर अगर किसी के पास समय है, और वो सेक-मालिश करना चाहे, तो उत्तम ही है।

दैनिक नस्य, जो कि मुख्यतः स्वास्थ्यरक्षण के हेतु से किया जाता है, कि मात्रा 4 बूँद है। ये चार बूँद मतलब आजकल के प्लास्टिक ड्रॉपर के 4 बूँद नही, तो मध्यमांगुली (Middle finger) तैल/घी मे डुबोकर जो बूँद उंगली के अग्रभाग पर आये वो 1 बूँद समझकर ऐसे 4 बूँद से नस्य करना है।दैनिक नस्य करने के लिए पलंग पर सोकर सिरहाना (तकिया, Cushion) निकाल कर, सिर थोडा जमीन की तरफ झुकाकर, सुखोष्ण गर्म किये हुए तैल या घी के 4-4 बूँद एक-एक नासापुट मे डालना चाहिए। अर्थात किसी और को डालने के लिए कहना चाहिए। उसके बाद करीबन डेढ मिनिट तक सोकर उठके बैठना चाहिए। दैनिक नस्य मे चूँकी स्नेह की मात्रा अत्यल्प रहती है, इसलिए नासापुट मे डाला हुआ स्नेह गले मे आये तो उसे निगल जाये। थुँकना हो तो भी दिक्कत नही। परंतु सच तो यह है की मात्रा अत्यल्प होती है, इसलिए कभी कभी गले मे स्नेह उतरता ही नही।

नस्य के बाद गले मे घी या तैल आया हो, तो गर्म पानी के कुल्ले कर के गला साफ किया जा सकता है। अगर पानी पानी हो तो 15मि. के बाद पिये और वो भी गर्म ही। मुखवास के रूप मे सौंफ, अजवायन खाया जा सकता है।

दैनिक नस्य को आयुर्वेदीय शास्त्रोक्त परिभाषा मे प्रतिमर्श नस्य कहा जाता है, तो विशेष नस्य को मर्श नस्य कहा जाता है।
दैनिक नस्य करने के एक ही दिन के 14 काल शास्त्र मे बताये गये है। व्यस्तता की वजह से पूरे 14 नही कर पाये, तो भी दिक्कत नही। सिर्फ कोई एक काल मे नियमित नस्य किया तो भी आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त होते है। 14 काल नीचे लिखे अनुसार है -
1) सुबह जागने के बाद तुरंत 2) दंतधावन के बाद 3) घर से बाहर निकलने के पहले 4) व्यायाम के बाद 5) मैथुन के बाद 6) खूब चलकर थकने के बाद 7) मलत्याग के बाद 8) मूत्रत्याग के बाद 9) कवल के बाद 10) अंजन के बाद 11) भोजन के बाद 12) वमन के बाद 13) दिन मे सोकर उठने के बाद 14) सायंकाल मे
प्रतिमर्श (दैनिक नस्य) आजन्ममरण प्रशस्त है अर्थात किसी को भी, किसी भी उम्र मे दिया जा सकता है। फिर भी अत्यल्प मात्रा की वजह से, निम्नलिखीत रुग्णों दैनिक नस्य भी नही करना चाहिए।
1) जिसके नाक से सर्दी की वजह से सतत पानी टपक रहा हो।
2) जिसने दारू पी रखी हो।
3) जिसे सुनाई नही देता हो।
4) जिसके सिर मे कृमि हो।
ऐसे रुग्णों मे मर्श नस्य की सलाह आयुर्वेद देता है, जो एक तज्ञ आयुर्वेदीक डॉक्टर की देखभाल मे ही करना चाहिए। अस्तु। शुभम भवतु।

श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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