स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 43

दिनचर्या भाग 9 - अंजन तथा आश्च्योतन

दिनचर्या भाग - 9

अंजन तथा आश्च्योतन

दिनचर्या उपक्रमों मे नेत्रसुरक्षा को ध्यान मे रखकर अंजन तथा आश्च्योतन जैसे उपक्रमों का भी समावेश किया गया है। वस्तुतः अंजन और आश्च्योतन इन दोनो उपक्रमों मे फर्क है, फिर भी दोनो नेत्रस्वास्थ्य बनाये रखने के लिए अतीव उपयोगी है।

आयुर्वेदानुसार आँखो का स्वास्थ्य बना रहे इसलिए रोज 'सौवीर' नामक अंजन का प्रयोग करना चाहिए। सामान्य बोलचाल की भाषा मे अंजन का मतलब काजल या सुरमा होता है। परंतु यह शब्दसाधर्म्य सिर्फ अंजन का अर्थ पता चले इसलिए बताया है। मूलतः सौवीरांजन और काजल दोनो भिन्न भिन्न द्रव्य है। परंतु दोनो नेत्र के लिए हितकर है और दोनो को प्रयुक्त करने के विधी भी एक जैसी ही है। 'सौवीर' अंजन यह एक संदिग्ध द्रव्य है। इसलिए यह आज प्रचलन मे नही। परंतु 'काजल' का प्रचलन है। काजल का प्रतिदिन प्रयोग किया जा सकता है। प्रतिदिन प्रयोग मे लायी जानेवाली काजल संभव हो तब तक घर पे ही बनायी हुई होनी चाहिए, न कि बाजार की बनायी हुई। काजल का अंजन करना भले ही 1 मिनीट का काम हो, फिर भी उसकी प्रयुक्तता के लिए भी थोडी कुशलता तो चाहिए ही। काजल लगाते समय थोड़ी भी उँगली इधर उधर हुई तो आँखों को नुकसान हो सकता है। इसलिए आजकल की दौडधूप वाली जिंदगी मे बहोत ही कम लोग काजल का उपयोग करते है।

नेत्रस्वास्थ्य बनाये रखनेवाले दूसरे उपक्रम का नाम 'आश्च्योतन' है, जो आजकल सबसे ज्यादा प्रचलित है। इसका कारण है, उसे प्रयुक्त करने की सौकर्यता, सुलभता। सांप्रतकाल मे नेत्रसुरक्षा के उपायों मे आश्च्योतन की सदैव अहम भूमिका रही है। आश्च्योतन अर्थात आँखो मे औषधी द्रव्य के बूँद डालना। यह एक अत्यंत सरल विधी है, इसलिए इसके विस्तृत विवरण की कोई आवश्यकता नही है। आश्च्योतन करने का कोई विशेष समय नही होता। अतः एव कभी भी किया जा सकता है। आश्च्योतन मे बिंदुओं की मात्रा नेत्रस्वास्थ्यरक्षण एवं नेत्रव्याधीप्रशमन इन दो उद्देश्यों पर निर्भर करती है। उद्देशभेद से एक ही औषधी की मात्रा मे अंतर आ सकता है। बिंदुओं की मात्रा वैद्य की सलाहनुसार ही निर्धारित करनी चाहिए। बाजार मे कई प्रकार के बने बनाये नेत्रबिन्दु उपलब्ध है, उसमे से रसायन गुणवाले (eye tonic) नेत्रबिन्दू है, उनके 2-2 बूँद प्रत्येक आँख मे डालने चाहिए। लेकिन इन के नियमित उपयोग के पहले भी किसी कुशल नेत्रवैद्य की सलाह लेना आवश्यक होता है। रसायन गुणोवाला कोई भी नेत्रबिन्दू यदि नियमीत रूप से उपयोग मे लाया जाये तो आँखों की कई सारी व्याधियाँ नही होती और कोई व्याधी है भी तो निश्चित रूप से रुग्ण को उस से फायदा ही होता है। विशिष्ट व्याधी के लिए उपयोग में लाये जानेवाले नेत्रबिन्दु व्याधी की तीव्रता के अनुसार तथा वैद्यराज की सलाहनुसार हर एक घंटे या आधे घंटे के अंतराल से भी आंखों में डाले जा सकते है।
सम्प्रति घरेलू तौर पे मध, दूध, शिवाम्बु (स्वमूत्र) जैसे द्रव द्रव्यों का आश्च्योतन के लिए उपयोग किया जाता है। शिवाम्बु का आश्च्योतन तो नेत्ररोगो मे चमत्कारो का सृजन करता है। रोज प्रातःकाल नींद से उठने के बाद तुरंत, शिवाम्बु की मध्यधारा एक स्वच्छ एवं निर्जंतुक काँच के कप मे लेकर स्वच्छ ड्रॉपर की सहायता से आँखो मे 2-4 बूँद डालना चाहिए। इस प्रयोजनार्थ लिये जाने वाला शिवाम्बु ताजा ही होना चाहिए। सुबह संगृहीत शिवाम्बु सायंकाल तक उपयोग मे नही लाना चाहिए और वैसे लाया भी जाये, तो कोई नुकसान नही, सिर्फ आँखे बहोत जलती है और लाल हो जाती है। आँखो की यह लाली एक घण्टे मे कम हो जाती है। इसीलिए शक्य हो तब तक शिवाम्बु ताजा ही उपयोग मे लाना चाहिए। श्रद्धा और धैर्य के साथ यदि दीर्घकाल तक शिवाम्बु का आश्च्योतन किया जाये, तो दृष्टी से सम्बंधित कैसी भी उग्र व्याधी हो, ठीक हो जाती है।

किसी कारणवश आँख में सूजन एवम लालिमा उत्पन्न हुई हो तो ताजे गोदुग्ध अथवा स्त्री दुग्ध का भी आश्च्योतन के लिए उपयोग किया जा सकता है।

आजकल प्रदूषण बहोत बढ़ गया है। बाहर जाते वक्त गॉगल का उपयोग आँखो की कुछ हद तक सुरक्षा जरूर करता है परंतु फिर भी आँखों मे जलन, शुष्कता ऐसे लक्षण उत्पन्न होना अब आम बात हो गयी है। इसमें समस्या ये है कि आप इन्हें टाल भी नही सकते। इसलिए रोज बिना भूले घर पर बनाए हुए, स्टील के बर्तन में सुरक्षित रखे हुए गाय के घी का नेत्रबिन्दु के रूप में उपयोग करना चाहिए। इससे निश्चित रूप से फायदा होता ही है। गाय का घी आँखो में डालने से पहले हल्का गरम कर लेना चाहिए और पूरा ठंडा भी न हो, उसके पहले ही आँखो में डालना चाहिए।

आज बाजार में गुलाब जल में सिक्त (soaked) कई आयुर्वेदिक नेत्रबिन्दु उपलब्ध है, जिनका उपयोग सहजता से कही भी, कभी भी किया जा सकता है। इनका रात को सोने के पहले और सुबह उठने के बाद तुरंत उपयोग करने से आँख स्वस्थ बने रहते है। परंतु ध्यान रहे, यह उपाय रोज करना चाहिए। मोतियाबिंद जैसी अवस्था उत्पन्न होने के बाद उसके निवारणार्थ इनका विशेष उपयोग नही होता। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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