स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 44

दिनचर्या भाग 10 - कर्णपूरणम

दिनचर्या भाग १० - कर्णपूरणम
Filling the Ear

परिचय -
कर्णपूरण यह दिनचर्या का एक उपक्रम है। कर्णपूरण अर्थात तिल तैल अथवा अन्य किसी भी औषधसिद्ध तैल से कान भर देना। कर्णपूरण नित्य करना चाहिए ऐसा आयुर्वेद का आदेश है। इससे दैनिक जीवन में यह कितना महत्वपूर्ण है इस बात का पता चलता है। कर्णपूरण यह एक बहोत ही आसान दिनचर्या उपक्रम है, जिसे एक बार समझने के बाद घर पर ही किया जा सकता है।

कर्णपूरण का समय -
आयुर्वेद के आदेशानुसार कर्णपूरण नित्य करना चाहिए। परंतु दिन मे कब करना चाहिए। इसका कही वर्णन नही मिलता। वैसे भी यह एक अत्यंत छोटा उपक्रम होने की वजह से यह दिन मे कभी भी जब समय मिले तब किया जा सकता है। एक कान का कर्णपूरण करने के लिए सिर्फ 5 से 6 मिनीट का समय लगता है।

पूर्वकर्म -
कर्णपूरण करने के पहले किये जानेवाले कर्म को पूर्वकर्म कहा जाता है। जैसे क्रिकेट के मैदान पर खेल शुरू होने से पहले मैदान तैयार किया जाता है, बस वैसे ही कर्णपूरण की मुख्य प्रक्रिया शुरू करने से पहले कुछ तैयारी करनी पडती है, जिसे पूर्वकर्म कहां जाता है। इस पूर्वकर्म मे जिस कान मे तैल डालना हो, उस कान को तथा उसके आसपास मे तिलतैल हल्का गरम करके, गरम तैल से ही मालिश करनी चाहिए। 2 मिनीट तक मालिश करने के बाद, गर्म पानी की भाप से कान तथा उसके आसपास की जगह सेकनी चाहिए। इसके लिए पानी गर्म करके, उसमे नैपकिन भिगोकर भी विवक्षित (आवश्यक) जगह का सेक किया जा सकता है। सेक के लिए हेअर ड्रायर का भी उपयोग किया जा सकता है।

वास्तविक कर्णपूरण प्रक्रिया शुरू करने से पहले दो दीये की मोटी मोटी बाती बनाकर रखना चाहिए। जो कर्णपूरण पूरा होने के बाद कान में डाला हुआ तैल सोखकर बाहर निकालने के काम आता है। साथ में एक स्वच्छ कपड़ा भी रखना चाहिए, जिससे तैल डालते वक्त अगर गलती से कान के बाहर ही गिर गया तो पोछने के काम में आता है। तैल डालने के ड्रॉपर को साफ़ करके सुखाकर रखना चाहिए ताकि मुख्य कर्म में उसका उपयोग किया जा सके।

मुख्य कर्म -
पूर्वकर्म के तुरंत बाद मुख्य/प्रधान कर्म किया जाता है। पूर्वकर्म और प्रधान मर्म इन दोनों कर्मों के बीच 2 मिनिट से ज्यादा का समय नही होना चाहिए। इसके लिए तिल तैल अथवा कोई भी औषधिसिद्ध तैल स्टील की कटोरी मे हल्का गरम करके तुरंत काँच अथवा प्लास्टिक के ड्रॉपर से कान मे कोष्ण तैल डालना चाहिए। तैल डालते वक्त डालने वाले ने दूसरे हाथ से कान को थोडा नीचे और पीछे खीचना चाहिए, जिससे कान के अंदर की नली सीधी हो जाती है और तैल कान मे पूरे अंदर तक सरलतापूर्वक भर जाता है। तैल कान मे डालने के बाद कमसे कम 20 सेकंड और ज्यादा से ज्यादा डेढ़ से २ मिनिट रखना चाहिए। इसके पश्चात पहले बनाकर रखी हुई दिये की बत्ती कान मे डालकर तैल को सोख लेना चाहिए। बाद में रुई से कान को अंदर तक साफ कर लेना चाहिए, जिससे कान मे तैल का अंश किंचित भी न रहे।

पश्चात कर्म -
तैल सोखकर कान साफ करने के बाद फिर से एकबार कान उसके आसपास की जगह की मालिश करनी चाहिए तथा पानी की भाप से सेकना चाहिए। पश्चात सूखे कपडे से कान तथा आसपास की जगह को साफ करके सूखना चाहिए और बाहर जाते वक्त कान मे रुई का फाहा रखना चाहिए।
ध्यान रहे तैल सोखने के लिए या डालने के लिए इंजेक्शन की सिरिंज का उपयोग नहीं करना चाहिए। सिरिंज का उपयोग कान तथा कान के परदे को हानि पहुंचा सकता है।

कर्णपूरणम के फायदे -
रोज कर्णपूरण करने से कान के विकार नहीं होते। उम्र के साथ आनेवाला बहरापन रोज कर्णपूरण करने से नहीं आता। गर्दन जकड़ती नहीं। सार्वदैहिक वातवृद्धि में भी कर्णपूरण के अच्छे परिणाम पाए गए है। जिनको सतत सर्दी बनी रहती है ऐसे लोगो को रोज कर्णपूरण करना चाहिए। जो लोग रोज प्रवास करते है ऐसे लोगो को भी रोज कर्णपूरण करना हितकर होता है।

सावधानी -
कर्णपूरण सुगम एवं सरल होने के बाद भी, उसके संदर्भ मे एक सावधानी बरतना आवश्यक है और वो यह है की, कर्णपूरण सदैव नहाने के 20 - 30 मिनिट के बाद ही करना चाहिए। क्योंकि कर्णपूरण करने के बाद अगर नहाया जाये और गलती से भी कानो मे पानी बाकी हो, तो फंगल इन्फेक्शन होने की संभावना ज्यादा रहती है। इसलिए ही कर्णपूरण के बाद कान अच्छी तरह से साफ करना चाहिए कि जिससे कान मे पानी की वजह से नमी न रहे। यही नमी तैलसम्पर्क के पश्चात फंगल इन्फेक्शन होने के लिए पूर्वतयारी करके रखती है। इसलिए उपरोक्त सूचना का सक्ती से पालन करना चाहिए।
कर्णपूरण के बाद कान में अगर रूई का फाहा नहीं रखा तो कान के बाहरी हिस्से में धूल के कण जमना शुरू हो जाते है, जिससे ज्यादा मैल जमा होता है। इसलिए कानो में रुई का फाहा रखना जरुरी है अन्यथा रोज आपको कान से मैल साफ़ करना पड़ेगा जो की सिर्फ एक मिनिट का काम होता है और कही भी किया जा सकता है।
कान का स्वास्थ्य ठीक रहे इसलिए दैनिक किये जानेवाले कर्णपूरण मे तिल तैल का उपयोग करना चाहिए। परंतु अगर किसी कारणवश कान मे कोई तकलीफ हुई, तो वैद्यराज की सलाहनुसार औषधिसिद्ध तैल का उपयोग करना चाहिए। अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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