स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 45

दिनचर्या भाग 11 - माध्यान्हभोजनम

दिनचर्या मे उल्लेखित जितनी प्रक्रियाये है, वो सभी प्रक्रियाए शरीर के ज्ञाननेंद्रिय तथा कर्मेन्द्रिय को स्वस्थ रखने के लिए बताये गये है। माध्यान्हभोजनम यह दिनचर्या के उपक्रमों मे उल्लेखित नही है, क्योकि यह इन उपक्रमों से परे है। माध्यान्हभोजन/ भोजन यह जीवन का आधार है। जीवन संतति (Continuity of life) बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक है। इसलिए आचार्यों ने इसे दिनचर्या मे नही रखा क्योंकि इसकी महत्ता तथा उपयोगिता संदेह से परे है। परंतु कही न कही भोजन ग्रहण काल के बारे मे जानकारी पाठकों के सामने प्रस्तुत करनी थी। इसलिए आज माध्यान्हभोजनम को प्रस्तुत लेख की विषयवस्तु बनाया गया है।

आहार सेवन जीवन संतति के लिए एक आवश्यक कर्म है। आहार ही जीवन का आधार है। बिना आहार सेवन के मनुष्य को अस्तित्व टिकाये रखना मुश्किल है। आहार से शरीर बनता है, बढता है अर्थात स्वस्थ रहता है। परंतु यही आहार जो शरीर स्वस्थ रखने के लिए ग्रहण किया जाता है, अगर गलत समय पर या गलत तरीके से लिया गया तो यह मनुष्य को स्वस्थ रखने के बजाए रोग उत्पादकर सिद्ध होता है। आहार कितना लेना चाहिए, कैसा लेना चाहिए, कब लेना चाहिए, कहाँ लेना चाहिए? इन सब विषयों पर स्वामीआयुर्वेद द्वारा पहले एक श्रृंखला चलाई गई है, जो पाठकों द्वारा पढी ही गयी होगी।

आयुर्वेद दो काल भोजन करने की सलाह देता है। सुबह तथा शाम को। सुबह का मतलब 10 से 12 बजे तक और सायंकाल के भोजन के बारे मे आयुर्वेद कहता है की सूर्यास्त से पहले भोजन कर लेना उचित होता है। सुबह 10 बजे से लेकर 12 बजे तक का जो भोजन काल है, उसमे सबको अपने अपने सहूलियत के हिसाब से भोजन का समय तय कर लेना चाहिए। जैसे अगर 10 बजे खाना है, तो रोज 10 बजे ही खाना चाहिए। खाने के इस समय मे 15 मिनीट आगे पीछे हो तो दिक्कत नहीं परन्तु आज 10 बजे तो कल 11 बजे और परसो 12 बजे ऐसा नही होना चाहिए। 10 - 15 दिनों मे एकाध बार कार्यव्यस्तता वश अगर आहार ग्रहण के समय में ऐसी विषमता उत्पन्न हो जाये, तो कोई बडी समस्या नही है। एक दिन की इस विषमता को शरीर समायोजित (Adjust) कर लेता है। परंतु यही हाल अगर रोज रोज का रहा, तो फिर अनन्तर काल मे समस्याए उत्पन्न हुए बगैर नही रहती।

ड्राइवर, मार्केटिंग करनेवाले, पोस्टमन, कूरीयरवाले ऐसे तथा अन्य अनेक व्यवसाय करनेवाले लोगों के आहारसेवन काल में भयंकर विषमता होती है। शरीर यह विषमता तब तक सहन कर लेता है, जब तक शरीर मे वयसुलभ बल होता है। बाद मे जैसे जैसे उम्र बढती है, वैसे वैसे ऐसी विषमताओंसे समायोजन करने की शरीर की शक्ति दुर्बल हो जाती है और एक दिन शरीर की सहनशक्ति जवाब दे देती है और फिर उस समय से ही व्याधि उत्पत्ति की शुरुवात होती है।

कुछ लोग व्यवसाय व्यस्तता की वजह से दोपहर 2 या 3 बजे भी खाना खाते है, परंतु यह सर्वतोपरि गलत है। भले यह आदत आपको पिछले कई वर्षों से होगी और आजतक आपको इससे कोई तकलीफ नही हुई होगी, इसका अर्थ यह नही की आप जो कर रहे हो, वह सही है। कुछ लोग इसका उत्तर देते वक्त कहते है की हम पिछले 30 साल से दोपहर 3 बजे ही खाना खा रहे है। पर हमे तो आजतक कुछ भी नही हुआ। ऐसे लोगो के संदर्भ मे एक विशेष वस्तु देखने मे आई है कि भले ही 30 साल तक इन्हे कुछ नही हुआ पर 31 वे साल से नये नये व्याधिनिर्माण की जो श्रृंखला उनके शरीर मे शुरू होती है। उसका अंत उनके शरीर के साथ ही होता है ऐसा देखा गया है। इसलिए उचित समय पर ही शरीर को हितकर आहार ग्रहण करे।
भोजन से संबधित कुछ आयुर्वेदोक्त सामान्य नियम निम्नानुसार है, जिनका यशाशक्ति पालन करना स्वस्थ रहने के अत्यावश्यक है।

1) भोजन नियत समय पर ही लेना चाहिए। नियत समय के 15 मिनीट आगे पीछे भी खाया जा सकता है।परन्तु इसे अपवाद समझे, नियम नहीं।

2) भोजन के पहले पानी नही पीना चाहिए। परंतु अगर आप बाहर से बहोत ही थक कर आये हो और भूख और प्यास दोनो ही लगी है, तो गरम पानी पिये, न कि ठण्डा और वो भी अल्प मात्रा मे ही। फिर थोड़ा समय रुके और पश्चात ही आहार ग्रहण करे।

3) खाना खाते बीच मे थोडा पानी पीना चाहिए। जो पाचन के लिए अच्छा होता है। परंतु अगर खाने के बीच पानी पीने के आदत नही है, तो जबरदस्ती नही पीना चाहिए। बीच बीच मे पिए जाने वाले पानी की मात्रा भी 200 मिली से ज्यादा नही होनी चाहिए। खाते वक्त अगर छाछ पीने की आदत है, तो छाछ भी 200 मिली से ज्यादा नही पीनी चाहिए। कुछ सज्जन १ लीटर तक छाछ पीते देखे गए है। इतनी ज्यादा मात्रा में पी गई छाछ लाभ की जगह हानि ही करती है। ऐसे लोगो को पाचन के भयंकर विकार उत्पन्न होते देखे गए है।

4) खाना खाते वक्त बातें नही करनी चाहिए। टीवी, मोबाइल नही देखना चाहिए। मतलब अपना पूरा ध्यान आहार सेवन की ओर ही केंद्रित करना चाहिए।

5) भोजन करते वक्त सीधे (upright position) बैठना चाहिए। झुककर खाना नही लेना चाहिए।

6) खाना खाने के बाद सिर्फ मुँह धोकर साफ करना चाहिए पानी नही पीना चाहिए अगर पीना ही हो, तो एक घूँट से ज्यादा नही।

7) खाने के बाद 100 कदम तक चल कर शांति से बैठना चाहिए। कोई बैठा काम है, तो करने मे दिक्कत नही। परंतु मेहनत वाला काम नही करना चाहिए। कुछ वैद्य खाने के बाद 2000 कदम चलने की सलाह देते है। परंतु शास्त्र मे स्पष्टरूप से 100 कदम चलने का ही निर्देश दिया है।

8) चलने के बाद थोडी देर बायी करवट (Left lateral position) पर लेटना चाहिए। इसे आयुर्वेदीक परिभाषा मे 'वामकुक्षी' कहा जाता है। स्मरण रहे, आयुर्वेद सिर्फ लेटने की बात करता है, सोने की नही। आजकल कुछ लोग 'पॉवरनॅप' अर्थात कुछ समय के लिए सोने को प्रोत्साहित करते है। परंतु शास्त्र इस बात को स्पष्ट रूप नकार देता है।

9) खाने के 2 घण्टे बाद पानी पीना चाहिए। गर्मी के दिनो मे खाने के बाद इतने समय बिना पानी के रहा नही जाता, फिर भी डेढ घण्टे से पहले तो पानी पीना ही नही चाहिए। अन्यथा पाचनशक्ति दुर्बल हो जाती है। ठण्डी के दिनो मे 2 घण्टे बाद पीये जानेवाला पानी संभव हो तो, गर्म ही पीना चाहिए। गर्मी के दिनो मे ठण्डा पानी पीना चाहिए। परंतु यहा ठण्डा का मतलब है, सादा पानी। फ्रीज या कूलर का नही। अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत.

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