स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 46

दिनचर्या भाग 12 - ताम्बूलसेवनम

भोजन मे मधुरादि रसों से परिपूर्ण खाद्यपदार्थ होते है। इसलिए भोजनोत्तर मुख मे चिकनाहट उत्पन्न होती है। अगर मीठा या वसायुक्त (fatty) पदार्थ ज्यादा हो तो यह चिकनाहट जरा ज्यादा ही उत्पन्न होती है। इसलिए भारतीय आहारशास्त्र मे भोजनोत्तर मुखवास का उपयोग सूचित किया गया है। मुखवास के रूप मे आजकल तरह तरह के पदार्थ बाजार मे उपलब्ध है। जो स्वतः इतने मीठे होते है की भोजन के बाद मुख मे उत्पन्न हुई चिकनाहट को दूर करने की बजाए बढा देते है इसलिए शास्त्र जिस बात का समर्थन करता है मुखवास के रूप मे उसी का सेवन करना चाहिए।

आयुर्वेद मे ताम्बूल सेवन का दिनचर्या अंतर्गत वर्णन किया है। ताम्बूल अर्थात नागरवेल का पान। इसे इंग्लिश में Betel leaf ऐसा बोला जाता है। ताम्बूल सेवन दोनों भोजनकाल के बाद करना चाहिए। सिवाय नस्य गण्डूष, धूम्रपान के बाद भी ताम्बूल सेवन का निर्देश शास्त्र में किया गया है। चूँकि ताम्बूलसेवन दिनचर्या मे उल्लेखित है मतलब शास्त्रकारों को ताम्बूल का नियमित सेवन अपेक्षित है। परंतु अनिवार्य नही। अगर किसी व्यक्ति को पान खाना अच्छा नही लगता तो वो इस उपक्रम का पालन करने के लिए बाध्य नही है।

भारतवर्ष मे अति प्राचीनकाल से नागरवेल के पान का उपयोग मुखशुद्धि, रुचीवृद्धि और सुगन्धि के लिये किया जाता है। नागरवेल कि कई सारी प्रजातियाँ अपने भारतवर्ष में पाई जाती है, पर उसमे कलकत्ता, बनारसी और मघई गुणवत्ता की दृष्टी से श्रेष्ठ मानी जाती है। सामान्यत पान भोजन के बाद मुख की चिकनाहट दूर करने के लिये खाया जाता है। जिससे मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित हो जाता है। पान का बीडा बनाते वक्त एक बार मे अधिक से अधिक दो पान लेकर उसमे चुना, कन्था लगाकर खाया जाता है। पान मे अपनी पसंद के हिसाब से सौंफ, गुलकंद,जावित्री,जायफल, लौंग,इलायची,कपूर, कंकोल इत्यादी सामग्री डाली जा सकती है। पर आजकल तो, न जाने पान मे क्या क्या डाला जाता है। तरह तरह की सैकरीन की बनी कृत्रिम चटनियाँ और मसालो का उपयोग पान का स्वाद बढाने के लिये किया जाता है, जिसके परिणाम स्वास्थ्य के लिये अत्यंत हानीकारक होते है। पान मे सुपारी एवं तम्बाखू डालकर खाने का भी प्रघात है और और इसके घातक परिणाम तो जगजाहिर है, इसीलिए उनके बारे मे कुछ अधिक लिखने की आवश्यकता नही है। आजकल जो पान खाया जाता है उसमे सिर्फ पान ही अकेला शास्त्रोक्त बचा है बाकी सब शास्त्रविरुद्ध है।

पान किसे खाना चाहिये और किसे नही, इस बारे मे आयुर्वेद के दिशानिर्देश अत्यंत स्पष्ट है। जिन्हे अम्लपित्त जैसे पित्तविकार है, जिनके मुँह से लेके गुदा तक कही भी जखम हो, जिनका शरीर रुक्ष हो जैसे रेगिस्तान मे रहनेवाले लोग या फिर जिनकी कैंसर के लिये केमोथेरपी और रेडियोथेरेपी चालू हो, हर प्रकार के नेत्ररोगी, किसी भी कारण से जिसका शरीर सुख गया हो (Cachexia), जिनके रक्त मे प्लेटलेट्स की कमी हो, जो दारू पीते हो, जिनका 'Dehydration' हुआ है, जो प्रवास करके या कोई मेहनतवाला काम करके थका हुआ हो, ऐसे सभी लोगो को पान नही खाना चाहिये।

पान गुणों मे उष्ण, तीक्ष्ण एवं कफ:निस्सारक होता है, इसीलिये श्वसनसंस्था के कफप्रधान विकारों मे पाचन संस्थान के अजीर्ण, अग्निमंदता जैसे विकारों में इसका उपयोग किया जा सकता है। खाँसी और दमा जैसे विकारों मे पान अदभुत काम करता है। पान कामवासना भी बढ़ाता है, इसलिए रतिकाल से पहले इसका सेवन लाभदायी रहता है। सीमित मात्रा मे इसका सेवन शरीर के लिये अच्छा रहता है, पर अधिक सेवन एक प्रकार का दुर्व्यसन है और तरह तरह के विकारों को आमंत्रित करता है।अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत.

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