स्वामीआयुर्वेद स्वास्थसूत्रमाला - 48

दिनचर्या भाग 14 - शयनम

दिनचर्या भाग 14

शयनम (Sleep)

शयनम अर्थात सोना (sleeping)। दिनचर्या मे सायंभोजनम के बाद सोने का समय होता है।अर्थात भोजन सेवन के 3 घण्टे बाद ही सोने का समय होता है, भोजन के बाद तुरंत नही। परंतु कुछ व्यवसायी लोग देर रात को घर आते है, खाना खाते है और तुरंत सो जाते है। ऐसा नही करना चाहिए। यही सातत्य अगर वर्षों तक रहा पाचन के विविध विकार शरीर मे घर बना लेते है।

निद्रासेवन अर्थात सोना यह दिनचर्या का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपक्रम है। यह इतना महत्वपूर्ण है की आयुर्वेद मे इसे दिनचर्या का एक अंग बताने की बजाए शरीर के 3 स्तम्भो मे से एक महत्वपूर्ण स्तंभ बताया है। आहार, निद्रा और ब्रम्हचर्य ऐसे ये 3 प्रधान स्तंभ है। इन तीनों का शास्त्रीय निर्देशो के अनुसार युक्तिपूर्वक उपयोग करने से शरीर का उस प्रकार धारण होता है, जिस प्रकार खम्भो से मकान स्थिर रहता है।

सुखपूर्वक तथा यथाकाल शयन करने से मनुष्य सुखी होता है ऐसा आयुर्वेद कहता है। शरीर पुष्ट होता है मतलब वजन बढ़ता है। शरीर के बल का रक्षण होता है, अर्थात शरीर का व्याधीक्षमत्व मजबूत होता है। रोगप्रतिकार शक्ति बढती है। मैथुनसामर्थ्य (Sex Power) बना रहता है। ज्ञान तथा दीर्घजीवन का लाभ भी भलीभाँति नींद आने पर ही मिलता है और नींद के न आने पर इनके विपरीत भावों की प्राप्ति होती है। जैसे सुख की जगह दुःख की प्राप्ती होती है। क्योंकि पर्याप्त मात्रा मे नींद न होने पर विविध विकारों की उत्पत्ति होती है और यही स्थिति दुःख का कारण बनती है। रोगप्रतिकारक शक्ति घटती है। इसकी वजह से अनावश्यक रात्रीजागरण करनेवाले लोगो मे बारबार कोई न कोई व्याधी को उत्पन्न होते हुए हम देखते है। आधुनिक विज्ञान ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि अनावश्यक रात्रीजागरण मनुष्य शरीर मे टेस्टोस्टेरोन कम करके मैथुनसामर्थ्य घटता है। इसीलिए उचित समय पर उचित समय तक सोना आवश्यक ही है। अच्छी नींद शरीर और मन की थकान को मिटाकर उन्हे तरोताजा बना देते है या यूँ कहो नई ऊर्जा का पुनः संचार कराते है। कम्प्यूटर जैसे रिस्टार्ट करने के बाद उसके 70-80% प्रोब्लेम्स दूर हो जाते है, बस वैसे ही नींद का है। इसलिए सम्यक (Proper) निद्रासेवन के लाभों मे दीर्घजीवन प्राप्त होना भी बताया है।

सम्यक निद्रासेवन के बारे मे आयुर्वेद कहता है की जिसे जितनी नींद आती हो उतना ही सोयें अर्थात कोई 6 घण्टे सोता है तो कोई 8 घण्टे सोता है, उसके हिसाब से नींद ले। आधुनिक विज्ञान एक सामान्य व्यक्ति के लिए औसतन 7-8 घण्टे की नींद लेने की सलाह देता है। परंतु कभी कभी कुछ विशेष प्रसंगों पर कम से कम 6 घण्टे की नींद भी पर्याप्त होती है, जो अपवादस्वरूप है। आयुर्वेद कहता है की रात को ही सोना चाहिए। वस्तुतः यह एक अत्यंत सामान्य वर्णन है, जिससे कोई भी व्यक्ति सहमत होगा ही। परंतु यही बात आजकल के युवावर्ग को समझानी पडती है। आजकल के युवा, रात को 1 से 3 बजे के बीच सोते है। तब तक कोई व्हाटसअप देखता है, तो कोई फेसबुक, तो कोई मोबाइल मे ही सिनेमा देखता है। यही परंपरा पूरे स्नातक तथा स्नातकोत्तर अवस्था मे रहती है। इसमे ही 5 - 6 या 8 साल तो सहज निकल जाते है।इसीलिए आजकल के युवाओं मे महाविद्यालयीन शिक्षण के दरम्यान ही कष्टसाध्य या असाध्य व्याधी शुरू हो जाते है।
रात मे जागने से शरीर मे रुक्षता बढ जाती है। इसीलिए रात को जागनेवाले लोगो की त्वचा, बाल सब रुक्ष हो जाते है। बालो मे रूसी बढ जाती है और त्वचा का तेज कम होना शुरू हो जाता है। यही रुक्षता कब्ज उत्पन्न करती है। इसलिए नाईट शिफ्ट करनेवाले लोगों मे यह समस्याए आम तौर पर पाई ही जाती है।

कुछ लोगो को डर की वजह से या किसी कौटुंबिक, सामाजिक चिंता की वजह से नींद ही नही आती ऐसे वक्त ये लोग जबरदस्ती नींद लानेवाली गोलियों का सेवन करते है। जो प्रकृतिविरुद्ध है। ऐसा कर आप अपने दिमाग को जबरदस्ती सुला तो सकते हो परंतु मन तो कार्यरत अवस्था मे ही रहता है। इसलिए गोली लेकर नींद लेना यह कोई निद्रानाश का उपचार नही हो सकता। उसके लिए मूल कारणों का निराकरण ही उचित रहता है। अन्यथा ऐसे उपायों से लाभ होने की बजाए उपद्रव होने की संभावनाए ही ज्यादा रहती है।

निद्रासंबंधी अन्य विचार -

आयुर्वेद दिन मे सोने का निषेध करता है। परंतु ग्रीष्म ऋतु मे दिन मे सोने की सलाह देता है। अत्याधिक उष्णता के कारण शरीर मे बढनेवाली रुक्षता को कम करने के लिए तथा रात्र अन्य ऋतुओं की अपेक्षा छोटी होने के कारण ग्रीष्म ऋतु (Summer) मे दिन मे सोने के लिए आयुर्वेद अनुमति देता है। परंतु इसके अतिरिक्त अन्य ऋतुओं मे दिन मे सोना कफकारक होता है। अतएव निषिद्ध है। कुछ लोग दोपहर को खाने के तुरंत बाद कुछ समय के लिए सो जाते है। ऐसा करने से पाचन में विकृति तो आती ही है, साथ मे शरीर का मांस धातु दूषित होने से तरह तरह के त्वचा विकार उत्पन्न हो जाते है।

दिन में कौन सो सकता है? -

1) अधिक बोलने से थका हुआ व्यक्ति
2) लंबे प्रवास के उपरान्त
3) बहोत ज्यादा चलकर थका हुआ व्यक्ति
4) अति मात्रा मे मद्यपान करके क्लान्त हुआ व्यक्ति
5) अधिक मैथुन करके थका हुआ व्यक्ति
6) अधिक गुस्से से दुःख से, डर की वजह से थका हुआ व्यक्ति
7) दमा से पीडित व्यक्ति, जिसे बारबार हिचकी आती हो अथवा जिसे अतिसार हुआ हो ऐसे रुग्णों को शास्त्र दिन मे सोने की अनुमति देता है।
8) बुढे, बालक, अति कमजोर तथा जो बहोत पतले (वजन 30 किलो से कम) है, ऐसे लोग
9) जिनको बार बार प्यास लगती है तथा जिनको शरीर मे कही न कही शूल (Pain) होता ही ही, जिनको आहार सेवन के बाद अजीर्ण हुआ हो
10) जो चोट लगकर घायल हुए हो (Road accident) तथा जो व्यक्ति पागल है, ऐसे लोगों को शास्त्र दिन मे सोने की अनुमति देता है।

दिन मे सोने का निषेध -

1) जो लोग स्थूल हो
2) जिन लोगो का कोलेस्टेरॉल, ट्रायग्लिसराईड बढा हुआ है।
3) जिनका कफ बढा हुआ हो
4) जो प्रतिदिन स्निग्ध आहार (Fatty Food) का सेवन करते है।
उपरोक्त लक्षण जिन लोगों में पाये जाते है, उन्हे दिन मे सोना नही चाहिए। फिर भले ही ग्रीष्म ऋतु ही क्यों न हो।
जिन लोगों को गले के विकार हो जैसे गले मे सूजन, वेदना, खराश हो, टॉन्सिलयटिस हो या थॉईरॉइड से संबंधित कोई विकार हो तथा जो विषबाधित हो ऐसे लोगों को तो रात मे भी नही सोना चाहिए। क्योंकि रात में सोने से ऐसे विकारों में वृद्धि ही होती है।
अकाल शयन के दुष्परिणाम -
दिनचर्या मे प्रत्येक उपक्रम को अनुसरण करने का एक विशिष्ट क्रम तथा समय होता है। वैसे ही सोने का भी एक विशिष्ट समय रहता है। आप कभी भी सो नही सकते। ऐसे अकाल सोने से मनुष्य की आँकलन शक्ति (Grasping power) कम हो जाती है। बुखार आता है। सम्पूर्ण शरीर गीले कपडे से ओढा हुआ है ऐसा लगता है। नाक से पानी आकर छींके शुरू हो जाती है। सिर मे दर्द शुरू हो सकता है। शरीर मे किसी भी हिस्से मे या पूरे शरीर पर सूजन आ सकती है। जी मचलना, भूख नही लगना तथा शरीरभावों के अभिसरण मे रुकावट आ सकती है। अर्थात उपरोक्त सभी समस्याए सिर्फ एक बार अकाल शयन करने से नही उत्पन्न होती यह ध्यान रहे। इसके लिए सातत्य आवश्यक होता है। इसलिए एक दिन अकाल शयन करने पर घबराने की आवश्यकता नही होती। परन्तु यही स्थिती बारबार न बने और उसके स्वास्थ्य पर कोई दुष्परिणाम न हो इसका ध्यान रखना चाहिए। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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